तमिलनाडु में हुई एक नई स्टडी ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। इसमें सामने आया है कि बिना किसी लक्षण वाले **25%** मध्यम आयु वर्ग के वयस्कों में दिल की बीमारी के संकेत मौजूद हैं। यह रिपोर्ट भारत के हेल्थकेयर सेक्टर में प्रिवेंटिव स्क्रीनिंग और इंश्योरेंस रिफॉर्म की बढ़ती मांग को दर्शाती है।
तमिलनाडु में 3,000 वयस्कों (उम्र 35 से 65 वर्ष) पर की गई इस स्टडी ने एक बड़े 'साइलेंट' हेल्थ रिस्क को उजागर किया है। रिसर्च में पता चला कि 4 में से 1 प्रतिभागी को दिल की कोई समस्या महसूस नहीं हो रही थी, लेकिन उनकी धमनियों में 'कोरोनरी आर्टरी कैल्सीफिकेशन' के लक्षण पाए गए। धमनियों का यह सख्त होना लंबे समय तक चलता है और गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है, जिससे परिवारों पर इलाज और सर्जरी का भारी आर्थिक बोझ पड़ सकता है।
रिएक्टिव से प्रिवेंटिव केयर की ओर बदलाव
भारतीय हेल्थकेयर मार्केट अब तक मुख्य रूप से 'टर्शियरी केयर' पर आधारित रहा है, जहां मरीज के बीमार होने के बाद इलाज पर फोकस किया जाता है। इस रिएक्टिव मॉडल के कारण परिवारों को अक्सर अपनी बचत और संपत्ति दांव पर लगानी पड़ती है। हालांकि, नई स्टडी संकेत देती है कि यदि हम प्रिवेंटिव केयर पर ध्यान दें, तो न केवल शारीरिक बल्कि आर्थिक बोझ को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।
इंश्योरेंस और डायग्नोस्टिक्स के लिए क्या है मौका?
यह बदलाव सीधे तौर पर इंश्योरेंस और डायग्नोस्टिक सेक्टर को प्रभावित कर सकता है। मौजूदा हेल्थ इंश्योरेंस प्लान्स अक्सर आपातकालीन स्थितियों के लिए बने हैं। यदि बीमा कंपनियां प्रिवेंटिव स्क्रीनिंग को कवर करना शुरू करती हैं, तो अर्ली डायग्नोस्टिक्स की डिमांड में बड़ा उछाल आ सकता है। डायग्नोस्टिक कंपनियों के लिए यह 'वन-ऑफ' टेस्ट की जगह रेकरिंग रेवेन्यू (recurring revenue) का नया रास्ता खोल सकता है। हैंडहेल्ड ईसीजी (ECG) डिवाइस, लिपिड स्क्रीनिंग और बीपी मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों का महत्व आने वाले समय में बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है।
निवेशकों और स्टेकहोल्डर्स के लिए अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि रेगुलेटरी एनवायरमेंट और प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनियां अपनी पॉलिसियों में कैसे बदलाव लाती हैं।
