Cancer Drugs Price: सुप्रीम कोर्ट ने हॉस्पिटल मार्कअप को बताया 'दिनदहाड़े डकैती', हेल्थकेयर सेक्टर पर मंडराया संकट

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AuthorMehul Desai|Published at:
Cancer Drugs Price: सुप्रीम कोर्ट ने हॉस्पिटल मार्कअप को बताया 'दिनदहाड़े डकैती', हेल्थकेयर सेक्टर पर मंडराया संकट

सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवाओं पर वसूले जा रहे भारी मार्कअप को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है और इसे 'दिनदहाड़े डकैती' करार दिया है। सरकार अब नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं पर **30%** का ट्रेड मार्जिन कैप लगाने पर विचार कर रही है, जो हॉस्पिटल्स के रेवेन्यू मॉडल के लिए बड़ा रिस्क हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता ने कैंसर की दवाओं के बढ़ते दामों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने निजी अस्पतालों द्वारा दवाओं पर लिए जा रहे अत्यधिक मार्जिन को सीधे तौर पर 'दिनदहाड़े डकैती' करार दिया है। कोर्ट का यह रुख लाइफ-सेविंग ऑन्कोलॉजी दवाओं को लेकर सरकार से सख्त नियंत्रण की मांग करता है।

निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?

हेल्थकेयर और हॉस्पिटल सेक्टर में काम करने वाली कंपनियों के लिए फार्मेसी रेवेन्यू मुनाफे का एक बड़ा जरिया है। कई बड़े हॉस्पिटल चेन अपनी जटिल क्लीनिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और दवाइयों के स्टोरेज के खर्च को इसी मार्जिन से कवर करते हैं। यदि सरकार नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30% तक सीमित करने का फैसला लागू करती है, तो हॉस्पिटल्स के ऑपरेटिंग मार्जिन पर सीधा दबाव पड़ सकता है।

इंडस्ट्री का क्या है तर्क?

Max Healthcare Institute जैसे बड़े दिग्गजों का मानना है कि बिलिंग में केवल दवा की कीमत ही नहीं, बल्कि मेडिकल स्टाफ, एडमिनिस्ट्रेटिव खर्च और हाई-क्वालिटी इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत भी शामिल होती है। हालांकि, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह कीमत बहुत ज्यादा है और मौजूदा रेगुलेटरी फ्रेमवर्क दवा कंपनियों द्वारा तय किए गए बेस प्राइस को नियंत्रित करने में नाकाम रहा है।

आगे क्या होगा?

भारतीय फार्मा मार्केट का लगभग 83% हिस्सा नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं के दायरे में आता है, जो अभी प्राइस कंट्रोल के दायरे से बाहर हैं। सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह अफोर्डेबल हेल्थकेयर और प्राइवेट हॉस्पिटल्स की वित्तीय व्यवहार्यता (Financial Viability) के बीच कैसे संतुलन बनाएगी। वहीं, 'जन औषधि योजना' के तहत मिलने वाली सस्ती दवाओं की मौजूदगी पहले ही पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर की कीमतों में बड़े अंतर को साफ कर रही है। निवेशकों को अब स्वास्थ्य मंत्रालय के अगले फैसलों पर पैनी नजर रखनी होगी, क्योंकि इसका सीधा असर हॉस्पिटल स्टॉक्स के रेवेन्यू पर पड़ सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.