Roche Pharma के इंटरनेशनल हेड जर्ग रूप (Jörg Rupp) ने दुनिया भर में बढ़ रही पुरानी बीमारियों (Non-communicable diseases) को लेकर चेतावनी दी है। करीब **300 करोड़** लोग इनकी चपेट में हैं, जिससे फार्मा कंपनियां अब पारंपरिक इलाज के बजाय लंबे समय तक चलने वाली केयर मॉडल की तरफ रुख कर रही हैं।
आर्थिक सेहत पर गहरा असर
Roche Pharma के जर्ग रूप के अनुसार, आज दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों में 75% हिस्सा इन्हीं क्रोनिक बीमारियों का है। इसका असर केवल हेल्थ सेक्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल प्रोडक्टिविटी के लिए एक बड़ा रिस्क बन चुका है। खराब सेहत के कारण वैश्विक GDP में 15% तक की गिरावट का अनुमान लगाया गया है।
फार्मा इंडस्ट्री का बदलता बिजनेस मॉडल
अब तक फार्मा कंपनियां 'एपिसोड-बेस्ड' (बीमारी होने पर इलाज) मॉडल पर काम करती थीं, लेकिन अब वक्त बदल रहा है। साल 2050 तक 65 साल से अधिक उम्र के लोगों की आबादी तीन गुना होने की उम्मीद है, जिसे देखते हुए कंपनियों को अब 'कंटीन्यूअस केयर' (लगातार देखभाल) पर शिफ्ट होना पड़ रहा है।
निवेश का नजरिया: R&D पर बड़ा दांव
इस नए दौर में वही कंपनियां टिकेंगी जो डायग्नोस्टिक्स, मॉनिटरिंग और इंटीग्रेटेड केयर में निवेश कर रही हैं। Roche ने तो साल 2025 में रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) के लिए CHF 12 बिलियन की भारी भरकम राशि आवंटित की है। यह साफ है कि आने वाले समय में उन फार्मा कंपनियों के शेयर बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं जिनका पाइपलाइन फोकस डायबिटीज, ऑन्कोलॉजी और कार्डियोवैस्कुलर सेगमेंट में मजबूत है।
रिस्क और चुनौतियां
हालांकि, यह मॉडल जितना आकर्षक दिखता है, इसमें रिस्क भी उतना ही है। भारी R&D खर्च से प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा, पेशेंट डेटा की प्राइवेसी और बदलते रेगुलेटरी नियमों पर भी निवेशकों को बारीकी से नजर रखनी होगी। भारत में भी फार्मा कंपनियां इसी राह पर हैं और क्रोनिक थेरेपी में अपना मार्केट शेयर बढ़ा रही हैं, जो लंबे समय के लिए एक पॉजिटिव संकेत है।
