एक नई ग्लोबल स्टडी के मुताबिक, बच्चों में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यह स्थिति न केवल अस्पतालों के लिए ऑपरेशनल चुनौती है, बल्कि फार्मा सेक्टर के सामने भी नई रिसर्च की मांग खड़ी कर रही है।
हाल ही में JAMA Pediatrics में प्रकाशित एक स्टडी ने दुनियाभर के हेल्थकेयर सेक्टर की चिंता बढ़ा दी है। 82 देशों में 1,06,000 से ज्यादा बैक्टीरियल सैंपल्स की जांच के बाद यह पाया गया कि निमोनिया और सेप्सिस जैसी बीमारियां अब आम एंटीबायोटिक्स से ठीक होना मुश्किल हो रही हैं। यह बदलाव हेल्थकेयर और फार्मा कंपनियों के लिए एक नए तरह का दबाव लेकर आया है।
अस्पतालों पर बढ़ता वित्तीय बोझ
'Watch' और 'Reserve' कैटेगरी के एंटीबायोटिक्स के खिलाफ बैक्टीरिया का रेजिस्टेंस बढ़ना आईसीयू (ICU) के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है। जब स्टैंडर्ड दवाएं बेअसर हो जाती हैं, तो इलाज लंबा खिंचता है और महंगे डायग्नोस्टिक टूल्स का उपयोग बढ़ जाता है। इससे प्राइवेट हेल्थकेयर चेन के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। अब अस्पतालों को इंफेक्शन कंट्रोल के लिए 'AMR in Kids' जैसे सर्विलांस प्लेटफॉर्म्स में भारी निवेश करना होगा।
फार्मा सेक्टर के सामने दोहरी चुनौती
दवा कंपनियों के लिए समस्या यह है कि Klebsiella और Acinetobacter baumannii जैसे रेजिस्टेंट बैक्टीरिया से निपटने के लिए नई दवाओं की सख्त जरूरत है, लेकिन इनकी आरएंडडी (R&D) और क्लिनिकल ट्रायल बेहद जटिल होते हैं। वयस्कों के मुकाबले बच्चों की दवाओं का मार्केट साइज छोटा होने के कारण कंपनियों को आर्थिक लाभ कम नजर आता है। हालांकि, सरकारी नीतियों और ग्लोबल फंड में बदलाव के बाद, जो कंपनियां बच्चों के लिए विशेष एंटीमाइक्रोबियल सॉल्यूशंस लाएंगी, उनके पास मार्केट में बड़ा मौका होगा।
लॉन्ग-टर्म मार्केट इम्पैक्ट
अब समय आ गया है कि दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन प्रोटोकॉल को पूरी तरह बदला जाए। जैसे-जैसे 'लास्ट-लाइन' एंटीबायोटिक्स की प्रभावशीलता कम हो रही है, सरकारें इसके उपयोग पर सख्त रेगुलेशन लागू कर सकती हैं। इन्वेस्टर्स को यह ध्यान रखना होगा कि अब फार्मा इंडस्ट्री केवल हाई-वॉल्यूम दवा बिक्री से हटकर सर्विलांस और टारगेटेड ट्रीटमेंट मॉडल की ओर बढ़ रही है। भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां आरएंडडी की आर्थिक बाधाओं को पार करके अगली पीढ़ी की दवाएं कितनी जल्दी ला पाती हैं।
