बढ़ते तापमान का असर अब हेल्थकेयर सेक्टर पर भी दिखने लगा है। एक नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि गर्मी बढ़ने से मैटरनल हेल्थ (maternal health) की जटिलताएं बढ़ी हैं। ऐसे में हॉस्पिटल्स और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए नए निवेश और बदलावों की जरूरत महसूस की जा रही है।
बढ़ती गर्मी और स्वास्थ्य के बीच के सीधे संबंधों ने अब हेल्थकेयर सेक्टर की चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत समेत पांच देशों के 1,000 डॉक्टरों पर की गई एक रिसर्च में 73% हेल्थ प्रोफेशनल्स ने माना है कि पिछले 5 सालों में गर्भवती महिलाओं में गर्मी से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ी हैं। वेलकम (Wellcome) फाउंडेशन की इस रिपोर्ट के मुताबिक, तापमान में हर 1°C की बढ़ोतरी प्री-टर्म बर्थ (समय से पहले प्रसव) के रिस्क को 5% तक बढ़ा देती है।
हॉस्पिटल सेक्टर पर क्या होगा असर?
रिसर्च में सामने आया है कि 27% डॉक्टरों के अनुसार, लू और गर्मी के कारण मरीजों के लिए अस्पताल पहुंचना तक मुश्किल हो गया है। इसे देखते हुए अब बड़े हॉस्पिटल चैन्स को 'क्लाइमेट-रेसिलिएंट' इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करना पड़ सकता है। इसमें बेहतर कूलिंग सिस्टम और ट्रांसपोर्ट लॉजिस्टिक्स को अपडेट करना शामिल है, जिससे मरीजों को मुश्किल हालातों में भी इलाज मिल सके।
निवेश और पॉलिसी के नजरिए से क्या बदलेगा?
- डायग्नोस्टिक्स डिमांड: कॉम्प्लिकेटेड प्रेगनेंसी मामलों के बढ़ने से स्पेशलाइज्ड फीटल मॉनिटरिंग और डायग्नोस्टिक सर्विसेज की डिमांड बढ़ सकती है।
- सरकारी पॉलिसी: COP31 जैसे वैश्विक मंचों पर मैटरनल हेल्थ को क्लाइमेट अडैप्टेशन प्लान में शामिल करने की मांग उठ रही है। इससे आने वाले समय में सरकारी खर्च और रेगुलेटरी नियमों में बदलाव हो सकता है, जो हॉस्पिटल कंपनियों के कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) को प्रभावित करेंगे।
- इंश्योरेंस सेक्टर: बीमा कंपनियों को भी अब पर्यावरण से जुड़े इन रिस्क फैक्टर्स को अपने मॉडल में जोड़ना पड़ सकता है, जिससे भविष्य में प्रीमियम की संरचनाओं में बदलाव की संभावना है।
आने वाले समय में उन हॉस्पिटल चैन्स पर नजर रखना जरूरी होगा जो इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड और नई टेक्नोलॉजी में निवेश को प्राथमिकता दे रही हैं।
