नई रिसर्च के मुताबिक अमीर भारतीयों में दिल की बीमारी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ा है। **38%** से अधिक परिवार सालाना **₹1,00,000** से ज्यादा का मेडिकल खर्च उठा रहे हैं, जो हेल्थ इंश्योरेंस और डायग्नोस्टिक सेक्टर में बड़े बदलाव की ओर इशारा है।
अमीरों में बढ़ रही कार्डियोवैस्कुलर बीमारियाँ
American Journal of Preventive Medicine में छपी एक नई रिपोर्ट ने पुरानी धारणा को गलत साबित कर दिया है कि पैसा स्वास्थ्य की ढाल है। 45 साल से ज्यादा उम्र के 65,000 लोगों के डेटा से पता चला है कि ज्यादा लाइफस्टाइल से जुड़ी सुख-सुविधाएं अब दिल की बीमारियों का कारण बन रही हैं। खराब डाइट और सेडेंटरी लाइफस्टाइल (sedentary lifestyle) के कारण भारत के हेल्थकेयर सेक्टर में मरीजों का प्रोफाइल पूरी तरह बदल गया है।
आर्थिक बोझ और इंश्योरेंस की कमी
दिल की बीमारियों के इलाज का सालाना खर्च अब औसत ₹1,00,000 को पार कर गया है। करीब 38% परिवार इसे 'कैटास्ट्रोफिक' (catastrophic) यानी आपदा समान खर्च मान रहे हैं, क्योंकि ये उनकी सालाना कमाई का एक बड़ा हिस्सा खा रहा है। मौजूदा इंश्योरेंस पॉलिसी अक्सर ओपीडी (OPD) और मेंटेनेंस खर्च को कवर नहीं करतीं, जिससे लोगों को अपनी बचत से पैसा निकालना पड़ रहा है।
डायग्नोस्टिक गैप और पर्यावरण का असर
दिलचस्प बात यह है कि कम आय वाले वर्ग में बीमारियों का आंकड़ा कम दिख रहा है, लेकिन यह बेहतर सेहत नहीं, बल्कि टेस्टिंग की कमी है। भारत में 10% से कम लोग ही ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं को नियमित रूप से मॉनिटर कर पाते हैं। वहीं, भारत में दिल की बीमारियों के 31% मामलों के पीछे प्रदूषण एक बड़ा कारण है, जो समाज के गरीब तबके को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है।
निवेशकों के लिए मार्केट अपडेट
हेल्थकेयर और इंश्योरेंस सेक्टर में निवेश करने वालों के लिए यह एक संकेत है। भविष्य में उन कंपनियों को फायदा हो सकता है जो कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थ इंश्योरेंस और डायग्नोस्टिक सेवाएं प्रदान करती हैं। निवेशकों को अब इस सेक्टर में सरकार की नई पॉलिसियों और यूनिवर्सल कवरेज से जुड़े रेगुलेटरी बदलावों पर नजर रखनी चाहिए।
