एक नई स्टडी में 350 साइंटिफिक पेपर्स के एनालिसिस के बाद ये बात सामने आई है कि कम प्रोटीन खाने से उन लोगों की सेहत सुधर सकती है जो ज़्यादा एक्टिव नहीं हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि ज़्यादा प्रोटीन से उम्र बढ़ने और सूजन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
सेहत का नया फंडा: कम प्रोटीन, ज़्यादा उम्र?
एक नई अकादमिक समीक्षा (Academic Review) में पोषण (Nutrition) को लेकर एक बड़ा बदलाव सामने आया है। 'सेल प्रेस ब्लू' (Cell Press Blue) में छपी इस स्टडी के मुताबिक, जो लोग ज़्यादा सक्रिय जीवनशैली नहीं जीते, उनके लिए प्रोटीन की मात्रा कम करना सेहत के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है। इस रिसर्च में 350 साइंटिफिक पेपर्स का अध्ययन किया गया है। इसमें कहा गया है कि भले ही एक्टिव लोगों के लिए मसल्स बनाने के लिए प्रोटीन ज़रूरी है, लेकिन जो लोग ज़्यादातर बैठे-बैठे काम करते हैं, वे ज़रूरत से ज़्यादा प्रोटीन ले रहे हैं, जो लंबी उम्र के लिए ठीक नहीं है।
मेटाबॉलिक हेल्थ और सेल्स पर असर
यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन (University of Wisconsin-Madison) के डडली लैमिंग (Dudley Lamming) की अगुवाई में हुई इस रिसर्च में पता चला है कि प्रोटीन कम करने से वज़न कंट्रोल करने और ब्लड शुगर को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है, भले ही कुल कैलोरी की मात्रा उतनी ही रहे। स्टडी में कुछ ऐसे बायोलॉजिकल तरीके बताए गए हैं जिनसे ये बदलाव आते हैं। जब प्रोटीन की मात्रा कम होती है, तो शरीर में 'फाइब्रोब्लास्ट ग्रोथ फैक्टर 21 (FGF21)' नाम का हार्मोन बढ़ जाता है। इस हार्मोन को ज़्यादा एनर्जी खर्च करने, सूजन कम करने और मेटाबॉलिक हेल्थ सुधारने से जोड़ा गया है। जानवरों पर हुई स्टडीज़ में इन चीज़ों को लंबी उम्र से जोड़ा गया है।
खास एमिनो एसिड्स का रोल
यह रिव्यू कुछ खास एमिनो एसिड्स (Amino Acids) - मेथियोनीन (Methionine), आइसोल्यूसीन (Isoleucine) और वैलीन (Valine) - की ओर इशारा करता है। ये वो चीज़ें हैं जो बॉडी के ग्रोथ प्रोसेस को बढ़ाती हैं और अगर ज़्यादा मात्रा में ली जाएं तो उम्र बढ़ने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। इन एमिनो एसिड्स की हाई मात्रा मोटापे और उम्र के साथ होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ा सकती है। शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि बाज़ार में प्रोटीन-फोर्टीफाइड (Protein-fortified) खाने की चीज़ों का खूब प्रचार होता है, लेकिन अगर आप फिजिकली एक्टिव नहीं हैं तो शायद इनसे उतना फायदा न मिले। हालांकि, यह भी साफ किया गया है कि बूढ़े लोगों और प्रेग्नेंट महिलाओं को अपनी ज़रूरत के हिसाब से ज़्यादा प्रोटीन की ज़रूरत हो सकती है।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
हेल्थकेयर, बायोटेक्नोलॉजी और फूड प्रोसेसिंग सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए ये रिसर्च बताती है कि लोगों की हेल्थ से जुड़ी पसंद में बदलाव आ सकता है। अगर कम प्रोटीन खाने का चलन बढ़ता है, खासकर उन लोगों में जो ज़्यादा एक्टिव नहीं हैं, तो यह उन फूड कंपनियों के प्रोडक्ट डेवलपमेंट (Product Development) की रणनीति को प्रभावित कर सकता है जो प्रोटीन-फोर्टीफाइड या हाई-प्रोटीन प्रोडक्ट्स पर ज़्यादा निर्भर हैं। पहले भी फूड इंडस्ट्री ने हेल्थ-कॉन्शियस ग्राहकों के लिए प्रोटीन-एन्रिच्ड (Protein-enriched) प्रोडक्ट्स में काफी निवेश किया है। अब ज़्यादा सटीक न्यूट्रिशनल लेबलिंग (Nutritional Labeling) या प्रोडक्ट डिफरेंशिएशन (Product Differentiation) की ओर बढ़ना पैकेज्ड फूड कंपनियों के लिए एक नया संकेत हो सकता है। इसके अलावा, एमिनो एसिड्स की कमी से जुड़े थेरेप्यूटिक (Therapeutic) फायदे बायोटेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए नई राहें खोल सकते हैं जो लंबी उम्र और मेटाबॉलिक रिसर्च पर काम कर रही हैं। हालांकि, ये सब अभी रिसर्च के शुरुआती चरण में हैं।
