Lysosomal Storage Disorders Support Society ने सरकार से इमरजेंसी फंड की मांग की है। 'National Policy for Rare Diseases' के तहत तय **₹50 लाख** की लिमिट खत्म होने से **160** से अधिक मरीजों को मिलने वाला जरूरी इलाज बंद हो गया है।
देश में दुर्लभ बीमारियों (Rare Diseases) के इलाज को लेकर एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। Lysosomal Storage Disorders Support Society ने केंद्र सरकार से तत्काल इंटरिम फंडिंग की अपील की है। समस्या यह है कि 'National Policy for Rare Diseases' के तहत मिलने वाली ₹50 लाख की वित्तीय सहायता सीमा कम से कम 164 मरीजों ने पूरी कर ली है। फंड खत्म होने के कारण, गौचर (Gaucher) और पॉम्पे (Pompe) जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे करीब 115 मरीजों को अब जरूरी 'एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी' नहीं मिल पा रही है।
नीतिगत चुनौतियां (Policy Challenges)
साल 2021 में लाई गई यह पॉलिसी अल्ट्रा-रेयर बीमारियों के लिए बनाई गई थी, लेकिन ₹50 लाख की फिक्स्ड कैप ने मरीजों के लिए मुश्किलें पैदा कर दी हैं। जब मरीज इस खर्च की सीमा को पार कर जाते हैं, तो सरकार की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। चूंकि इन बीमारियों के लिए आजीवन इलाज की जरूरत होती है, इसलिए थेरेपी रुकने से मरीजों की सेहत में तेजी से गिरावट आ रही है।
फार्मा और हेल्थकेयर सेक्टर पर असर
दुर्लभ बीमारियों के लिए बनने वाली दवाएं, जिन्हें 'ऑर्फ़न ड्रग्स' (Orphan Drugs) कहा जाता है, काफी महंगी होती हैं। इनका पूरा दारोमदार सरकारी सब्सिडी और प्रोक्योरमेंट स्कीम पर टिका है। प्राइवेट इंश्योरेंस की कमी के कारण आम परिवारों के लिए इनका खर्च उठाना नामुमकिन है। जब फंड की कमी होती है, तो इन दवाओं के मैन्युफैक्चरर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स के सामने भी अनिश्चितता पैदा हो जाती है।
फिलहाल, यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी चल रहा है। हेल्थकेयर सेक्टर के स्टेकहोल्डर्स अब इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि क्या सरकार कोई सप्लीमेंट्री फंडिंग मैकेनिज्म लाएगी या पॉलिसी में बदलाव करेगी ताकि इलाज की निरंतरता बनी रहे।
