Raman Research Institute (RRI) के वैज्ञानिकों ने माइक्रो-जेल (microgels) के बहाव को नियंत्रित करने के लिए 'थर्मल शॉक' का एक नया तरीका खोज निकाला है। यह तकनीक भविष्य में कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज में दवा को सीधे प्रभावित अंग तक पहुंचाने में बड़ी मददगार साबित हो सकती है।
विज्ञान की दुनिया में बड़ी उपलब्धि
भारत के Raman Research Institute (RRI) के रिसर्चर सोनाली कवाले और प्रोफेसर रंजिनी बंद्योपाध्याय की टीम ने मटेरियल साइंस में एक बड़ा माइलस्टोन हासिल किया है। उन्होंने सफलतापूर्वक दिखाया है कि कैसे अचानक तापमान बदलकर, जिसे 'थर्मल शॉक' कहा जा रहा है, माइक्रो-जेल सिस्टम को तरल (liquid) की तरह बहने के लिए मजबूर किया जा सकता है। यह खोज उन ठोस पदार्थों को कंट्रोल करने का नया रास्ता खोलती है जिन्हें पहले आकार में बदलना मुश्किल था।
कैसे काम करेगी यह नई तकनीक?
माइक्रो-जेल पानी सोखने वाले बेहद छोटे कण होते हैं। जब इन्हें एक साथ पैक किया जाता है, तो ये 'जैम' होकर ठोस कांच (glass-like solid) जैसे हो जाते हैं। RRI की टीम ने पाया कि एक त्वरित 'थर्मल शॉक' ट्रिगर की तरह काम करता है, जिससे ये कण दोबारा व्यवस्थित होकर बहने लगते हैं। मेडिकल रिसर्च के नजरिए से यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे ऐसी डिलीवरी सिस्टम बनाना संभव हो सकता है जो दवा को शरीर में कहीं भी छोड़ने के बजाय सिर्फ ट्यूमर जैसे टार्गेटेड एरिया पर ही रिलीज करे।
भविष्य की राह और चुनौतियां
मौजूदा ड्रग डिलीवरी के तरीकों में दवा पूरे शरीर में फैलती है, जिससे कई साइड इफेक्ट्स होते हैं। इस नई रिसर्च में 34 डिग्री सेल्सियस के तापमान मार्कर की पहचान की गई है, जिस पर दवा रिलीज हो सकती है। यदि यह तकनीक क्लीनिकल प्रैक्टिस में सफल होती है, तो यह कैंसर थेरेपी में टॉक्सिसिटी को काफी कम कर सकती है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि यह अभी शुरुआती स्तर की वैज्ञानिक खोज है। इसे कमर्शियल या क्लीनिकल इस्तेमाल तक पहुंचने के लिए अभी बायो-कम्पैटिबिलिटी टेस्ट, लंबे क्लीनिकल ट्रायल्स और रेगुलेटरी मंजूरी जैसे कई जटिल पड़ावों से गुजरना होगा।
