प्राइवेट हॉस्पिटल संचालक केंद्र सरकार के उस नए आदेश का विरोध कर रहे हैं, जिसमें इलाज के रेट्स को सार्वजनिक रूप से डिस्प्ले करना अनिवार्य किया गया है। हॉस्पिटल्स का कहना है कि मेडिकल इलाज की जटिलताओं को एक फिक्स रेट कार्ड में नहीं बांधा जा सकता।
केंद्र सरकार ने पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से प्राइवेट हॉस्पिटल्स को अपनी सभी सेवाओं के रेट्स को प्रमुखता से प्रदर्शित करने का निर्देश दिया है। लेकिन इस फैसले के बाद प्राइवेट हेल्थकेयर सेक्टर में हलचल मच गई है। इंडस्ट्री लीडर्स का तर्क है कि यह पॉलिसी मेडिकल बिलिंग की जमीनी हकीकत को पूरी तरह नजरअंदाज करती है।
मेडिकल बिलिंग में क्यों है मुश्किल?
FICCI (फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) की हेल्थकेयर कमिटी का मानना है कि मेडिकल केयर को किसी आम रिटेल प्रोडक्ट की तरह नहीं देखा जा सकता। हॉस्पिटल की बिलिंग एक डायनेमिक प्रक्रिया है। एक ही सर्जरी के दौरान मरीज की कंडीशन, रिकवरी का समय और इलाज के दौरान आने वाली मेडिकल जरूरतों के हिसाब से बिल बदलता रहता है। हॉस्पिटल्स का कहना है कि फिक्स रेट दिखाने से मरीजों में भ्रम पैदा हो सकता है, क्योंकि आखिरी बिल अक्सर शुरुआती एस्टीमेट से अलग होता है।
दवाओं की कीमतों पर हो फोकस
भारतीय चिकित्सा संघ (Indian Medical Association) जैसे संगठनों का मानना है कि सरकार का ध्यान गलत जगह पर है। आलोचकों का कहना है कि यह केवल एक दिखावटी कदम है। हॉस्पिटल्स का तर्क है कि दवाओं और मेडिकल डिवाइसेस की लागत पर उनका नियंत्रण सीमित होता है। इंडस्ट्री अब सरकार से मांग कर रही है कि वे दवाओं की Maximum Retail Price (MRP) पर कड़ी निगरानी रखें, क्योंकि इससे मरीजों पर आर्थिक बोझ का असली कारण पता चलेगा।
निवेशकों के लिए यह एक बड़ा संकेत है कि सरकार हेल्थकेयर सेक्टर में पारदर्शिता और अफोर्डेबिलिटी को लेकर सख्त हो रही है। आने वाले समय में स्टेट हेल्थ डिपार्टमेंट्स इसे कैसे लागू करते हैं और क्या यह फार्मास्युटिकल प्राइसिंग में और सरकारी हस्तक्षेप का कारण बनता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
