केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भारतीय फार्मा कंपनियों को एक बड़ी चुनौती दी है। उन्होंने कंपनियों से जेनेरिक दवाओं के उत्पादन से ऊपर उठकर हाई-वैल्यू रिसर्च, बायोटेक्नोलॉजी और बायोसिमिलर्स पर फोकस करने को कहा है ताकि ग्लोबल मार्केट में भारत की स्थिति मजबूत हो सके।
इनोवेशन की ओर बढ़ते कदम
भारत हेल्थ ग्लोबल एक्सपो 2026 में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि 'दुनिया की फार्मेसी' के रूप में पहचान बनाने के बाद अब इंडस्ट्री को अगली छलांग लगानी होगी। उन्होंने जोर दिया कि अब समय आ गया है कि कंपनियां केवल वॉल्यूम-बेस्ड प्रोडक्शन के बजाय बायोटेक्नोलॉजी, बायोसिमिलर्स और नई दवाओं (New Molecule Development) के विकास पर अपना ध्यान केंद्रित करें।
R&D पर खर्च बढ़ाने की जरूरत
मंत्री ने माना कि जेनेरिक दवाओं पर पूरी तरह निर्भर रहना लॉन्ग-टर्म में सस्टेनेबल नहीं है। उन्होंने कंपनियों को चेतावनी दी कि उन्हें अपनी घरेलू रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में निवेश बढ़ाना होगा। डेटा के अनुसार, भारतीय फार्मा सेक्टर में R&D खर्च अक्सर जीडीपी का मात्र 0.7% के आसपास रहा है। कॉम्प्लेक्स ड्रग्स की ओर बढ़ने से न केवल प्रॉफिट मार्जिन बेहतर होगा, बल्कि ग्लोबल मार्केट में कंपनियों को एक मजबूत कॉम्पिटिटिव एडवांटेज भी मिलेगा।
सप्लाई चेन और आत्मनिर्भरता
गोयल ने सप्लाई चेन की कमजोरियों पर भी चिंता जताई। वर्तमान में, भारतीय कंपनियां एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) और की स्टार्टिंग मैटेरियल्स (KSMs) के लिए कुछ चुनिंदा देशों पर निर्भर हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी भौगोलिक निर्भरता जियोपॉलिटिकल अस्थिरता के समय जोखिम पैदा कर सकती है। सरकार अब ऐसी प्रोक्योरमेंट पॉलिसी की वकालत कर रही है जो सप्लाई चेन को डायवर्सिफाई कर सके और किसी भी आपात स्थिति में दवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित रखे।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों के लिए यह एक बड़े स्ट्रैटेजिक बदलाव का संकेत है। इस ट्रांजिशन में कंपनियों के कैश फ्लो और प्रॉफिट मार्जिन पर शुरुआती दबाव पड़ सकता है। मार्केट एक्सपर्ट्स के अनुसार, अब उन कंपनियों पर नजर रखना जरूरी होगा जो अपनी R&D क्षमताओं को सफलतापूर्वक बढ़ा सकती हैं और एपीआई (API) आयात पर अपनी निर्भरता को कम करने में सक्षम होंगी।
