दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है। सर्जन संजय कुलश्रेष्ठ ने कैंसर की दवाओं के अलावा अन्य दवाओं पर सरकारी नियंत्रण की मांग की है। वर्तमान में **76%** नई दवाएं प्राइस कैप के दायरे से बाहर हैं, जिससे निवेशकों की चिंता बढ़ गई है।
सुप्रीम कोर्ट में फार्मा सेक्टर की मौजूदा मूल्य निर्धारण नीति को लेकर एक बड़ा कानूनी मामला खड़ा हो गया है। पेडियाट्रिक सर्जन संजय कुलश्रेष्ठ ने कोर्ट से सवाल किया है कि सरकार का ध्यान केवल कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं पर ही क्यों है, जबकि बाजार का एक बड़ा हिस्सा अभी भी सरकारी नियंत्रण से बाहर है। यह सुनवाई उस समय हो रही है जब हाल ही में 9 अक्टूबर, 2026 को रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने कैंसर दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर विचार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने की घोषणा की है।
निवेशक क्यों हैं चिंतित?
चिंता का मुख्य विषय 'शेड्यूल्ड' और 'नॉन-शेड्यूल्ड' दवाओं का अंतर है। Drugs (Prices Control) Order, 2013 के तहत, सरकार आवश्यक दवाओं की अधिकतम कीमत (Ceiling Price) तय करती है। हालांकि, याचिका के अनुसार, अभी सिर्फ 24% नई लॉन्च की गई दवाएं ही इस दायरे में आती हैं। बाकी 76% बाजार में कंपनियां अपनी कीमतों को तय करने के लिए स्वतंत्र हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस रेगुलेटरी गैप के कारण दवाओं की कीमतों में भारी अंतर और मुनाफे के लिए अनुचित मार्जिन लिया जा रहा है।
मार्जिन पर क्या पड़ेगा असर?
भारतीय फार्मा कंपनियां अक्सर अपनी कम-मार्जिन वाली आवश्यक दवाओं के नुकसान की भरपाई हाई-मार्जिन वाली 'नॉन-शेड्यूल्ड' दवाओं से करती हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट सरकार को कार्डियक, एंटी-डायबिटिक और एंटीबायोटिक जैसी दवाओं को भी प्राइस कंट्रोल के दायरे में लाने का निर्देश देता है, तो कंपनियों का नेट मार्जिन दबाव में आ सकता है। जिन कंपनियों का बड़ा रेवेन्यू नॉन-शेड्यूल्ड पोर्टफोलियो से आता है, उनके लिए यह एक बड़ा रिस्क फैक्टर हो सकता है।
अब बाजार की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कोर्ट National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) को इस रेगुलेशन के दायरे को बढ़ाने का आदेश देगा, या फिर सरकार के मौजूदा सेगमेंटेड अप्रोच को ही सही ठहराया जाएगा।
