Uniform Code for Pharmaceutical Marketing Practices (UCPMP) 2024 को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। एक सिविल सोसाइटी ग्रुप ने पैनल में हितों के टकराव (Conflict of Interest) का आरोप लगाया है, जिससे फार्मा सेक्टर के लिए नए नियमों में देरी हो सकती है।
सरकारी विभागों के लिए मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्युटिकल्स की ओर से बनाए गए तीन सदस्यीय एक्सपर्ट कमिटी, जिसका काम 2024 UCPMP का ड्राफ्ट तैयार करना है, अब विवादों के घेरे में है। 'वर्किंग ग्रुप ऑन एक्सेस टू मेडिसिन्स एंड ट्रीटमेंट्स' ने इस कमिटी के पुनर्गठन की मांग की है।
क्यों मचा है विवाद?
विवाद की मुख्य वजह कमिटी में डॉ. नरेश त्रेहन को शामिल करना है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि डॉ. त्रेहन 'मेदांता' हॉस्पिटल ग्रुप का नेतृत्व करते हैं, जो एक प्राइवेट अस्पताल है। ऐसे में फार्मा मार्केटिंग को रेगुलेट करने वाली कमिटी में उनका होना हितों का टकराव पैदा कर सकता है। UCPMP 2024 का मुख्य उद्देश्य फार्मा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच के संबंधों को पारदर्शी बनाना और दवाओं की कीमतों में होने वाली अनुचित बढ़ोतरी पर लगाम लगाना है।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
फार्मा कंपनियों के लिए मार्केटिंग और डॉक्टरों के साथ जुड़ाव एक बहुत बड़ा 'कॉस्ट सेंटर' रहा है। यदि UCPMP के तहत सख्त नियम लागू होते हैं, तो कंपनियों को अपनी मार्केटिंग रणनीतियों में बदलाव करना होगा, जिसका सीधा असर उनके ऑपरेटिंग खर्च और प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ सकता है।
इसके अलावा, यह मामला नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) द्वारा पूर्व में की गई उन जांचों की याद दिलाता है, जिनमें अस्पतालों द्वारा दवाओं पर अत्यधिक मार्कअप लगाने की बात सामने आई थी। फिलहाल, सरकार की तरफ से पैनल को बदलने को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। निवेशकों को मंत्रालय के अगले कदमों और इस कोड के लागू होने की समय-सीमा पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इससे सेक्टर के नियमों में बड़ा बदलाव आ सकता है।
