फार्मा इंडस्ट्री में RDP प्लान पर बहस: क्या महंगी होंगी दवाएं?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
फार्मा इंडस्ट्री में RDP प्लान पर बहस: क्या महंगी होंगी दवाएं?

भारत में दवा उद्योग एक बड़े बदलाव की कगार पर खड़ा है। ऑर्गनाइजेशन ऑफ फार्मास्युटिकल प्रोड्यूसर्स ऑफ इंडिया (OPPI) रेगुलेटरी डेटा प्रोटेक्शन (RDP) लागू करने की मांग कर रहा है, जिसका मकसद भारत में नई दवाओं की खोज (Drug Discovery) के लिए विदेशी निवेश को बढ़ावा देना है। लेकिन, जेनेरिक दवा बनाने वाली कंपनियाँ इसका कड़ा विरोध कर रही हैं। उनका कहना है कि इससे सस्ती और ज़रूरी दवाओं तक लोगों की पहुँच मुश्किल हो जाएगी। यह बहस इस बात पर केंद्रित है कि कैसे नई दवाओं के अविष्कार को बढ़ावा दिया जाए और साथ ही भारत की सस्ती दवाएं बनाने वाले देश के तौर पर पहचान बनी रहे।

RDP क्या है और क्यों हो रही है मांग?

ऑर्गनाइजेशन ऑफ फार्मास्युटिकल प्रोड्यूसर्स ऑफ इंडिया (OPPI), जिसमें बड़ी मल्टीनेशनल दवा कंपनियाँ शामिल हैं, भारत में रेगुलेटरी डेटा प्रोटेक्शन (RDP) लागू करने की पुरजोर वकालत कर रही है। यह एक ऐसा ढाँचा है जो नई दवाओं के अप्रूवल के लिए रेगुलेटर्स को दिए गए क्लिनिकल और नॉन-क्लिनिकल डेटा पर इनोवेटर्स को एक निश्चित समय के लिए एक्सक्लूसिविटी (Exclusivity) देगा। इसका मतलब है कि जेनेरिक दवा बनाने वाली कंपनियाँ, इस खास डेटा का इस्तेमाल करके अपनी दवा का अप्रूवल तब तक नहीं ले पाएंगी, जब तक यह एक्सक्लूसिविटी पीरियड खत्म न हो जाए। OPPI का मानना है कि इससे भारत में बड़ी फार्मा कंपनियों को रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए निवेश करने का प्रोत्साहन मिलेगा।

जेनेरिक कंपनियों की चिंता: क्या महंगी होंगी दवाएं?

RDP की इस पहल का घरेलू जेनेरिक दवा निर्माताओं और पब्लिक हेल्थ के पैरोकारों की तरफ से कड़ा विरोध हो रहा है। इन लोगों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि RDP लागू होने से पेटेंटेड दवाओं का मोनोपॉली पीरियड (Monopoly Period) बढ़ सकता है। उनका तर्क है कि पेटेंट खत्म होने के बाद भी RDP की वजह से सस्ती जेनेरिक दवाओं को बाजार में आने में देर हो सकती है। ऐसे में, जीवनरक्षक और ज़रूरी दवाओं की पहुँच मुश्किल होने की आशंका है। यह भारत की उस पहचान पर भी असर डाल सकता है जहाँ से दुनिया के कई विकासशील देशों को सस्ती दवाएं मिलती हैं।

नवाचार (Innovation) और प्रतिस्पर्धा (Competition) के बीच संतुलन

OPPI का कहना है कि RDP भारत के रेगुलेटरी माहौल को ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के अनुरूप लाने के लिए ज़रूरी है। OPPI के डायरेक्टर जनरल अनिल मताई ने इस बात पर जोर दिया कि नई दवा को बाजार में लाने में लगने वाले कुल खर्च का केवल 25% ही शुरुआती पेटेंट से कवर होता है। बाकी 75% खर्च दवा की सुरक्षा और प्रभावशीलता को साबित करने के लिए किए जाने वाले परीक्षणों पर होता है। RDP इसी गोपनीय रेगुलेटरी डेटा की सुरक्षा के लिए है। OPPI का मानना है कि इससे डोमेस्टिक कंपनियाँ भी सिर्फ जेनेरिक उत्पादन पर निर्भर रहने के बजाय, हाई-वैल्यू वाली इनोवेटिव दवाएं बनाने की तरफ बढ़ सकती हैं।

वैश्विक तुलना और भविष्य की राह

इंडस्ट्री के जानकार चीन का उदाहरण देते हैं, जहाँ RDP लागू होने के बाद रिसर्च और डेवलपमेंट में भारी निवेश हुआ है। मई में, चीन ने भी एक RDP क्लॉज पेश किया है, जो कुछ खास तरह की केमिकल और बायोलॉजिक दवाओं के लिए 6 साल तक की सुरक्षा देता है। इसके पक्षधर मानते हैं कि इससे Pfizer, AstraZeneca, Eli Lilly और Roche जैसी बड़ी ग्लोबल कंपनियों ने चीन का रुख किया है।

पिछले साल के अंत में, सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) ने नई दवाओं के अप्रूवल में लेवल प्लेइंग फील्ड बनाने के लिए पब्लिक कमेंट्स मांगे थे, जिसके बाद यह बहस तेज हुई। सरकार इन प्रस्तावों का मूल्यांकन कर रही है, लेकिन अलग-अलग पक्ष इसके लॉन्ग-टर्म असर को लेकर बंटे हुए हैं। निवेशक और बाजार के जानकार इस बात पर नजर रखेंगे कि सरकार रिसर्च इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करने की जरूरत और आम लोगों के लिए सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के बीच कैसे संतुलन बनाती है।

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