भारत की राष्ट्रीय आवश्यक दवाओं की सूची (NLEM) को तुरंत अपडेट करने की मांग की जा रही है, जिसे 2022 के बाद से संशोधित नहीं किया गया है। नई कैंसर और डायबिटीज दवाओं को शामिल करने से सार्वजनिक स्वास्थ्य तक पहुंच पर असर पड़ सकता है और इन उपचारों पर मूल्य नियंत्रण का विस्तार हो सकता है।
NLEM अपडेट की ज़रूरत
देश के मरीज़ों के समूह भारत की राष्ट्रीय आवश्यक दवाओं की सूची (National List of Essential Medicines - NLEM) में तुरंत संशोधन की मांग कर रहे हैं। यह सूची, जिसमें वर्तमान में 384 दवाएं शामिल हैं, सरकारी स्वास्थ्य खरीद का मुख्य आधार है और देश में बिकने वाली दवाओं पर मूल्य नियंत्रण की सीमा तय करती है। वर्तमान सूची को सितंबर 2022 में अंतिम बार अपडेट किया गया था, और जानकारों का तर्क है कि यह वैश्विक चिकित्सा मानकों में नवीनतम प्रगति को प्रतिबिंबित नहीं करती है।
किन दवाओं को शामिल करने की मांग?
एक्सेस टू मेडिसिन्स एंड ट्रीटमेंट्स वर्किंग ग्रुप ने भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) से कई महत्वपूर्ण दवाओं को शामिल करने का औपचारिक अनुरोध किया है जो वर्तमान में सूची से बाहर हैं। विशेष रूप से, समूह 17 कैंसर-रोधी एजेंटों और चार सहायक दवाओं को जोड़ने की मांग कर रहे हैं। अनुरोधित दवाओं में बेवासिज़ुमैब (Bevacizumab), क्लैड्रिबाइन (Cladribine), डैसैटिनिब (Dasatinib), अर्लोटिनिब (Erlotinib), और इब्रुटिनिब (Ibrutinib) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, प्रस्ताव में नौ मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (monoclonal antibodies) को शामिल करने की बात है, जैसे एडेलिमुमैब (Adalimumab), जिनका उपयोग विभिन्न पुरानी और जटिल स्थितियों के लिए व्यापक रूप से किया जाता है।
दवा की कीमतों और बाज़ार पहुंच पर असर
निवेशकों और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के लिए, NLEM एक महत्वपूर्ण रेगुलेटरी टूल है क्योंकि इस सूची में शामिल दवाओं पर राष्ट्रीय दवा मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा मूल्य नियंत्रण लागू होता है। जब कोई दवा NLEM में जोड़ी जाती है, तो उसकी अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) तय कर दी जाती है, जिससे निर्माताओं के मार्जिन में कमी आती है। हालांकि, बढ़ी हुई पहुंच के कारण बिक्री की मात्रा बढ़ सकती है।
इस अपडेट की मांग काफी हद तक भारत की वर्तमान सूची और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की मॉडल सूची के बीच के अंतर से प्रेरित है, जिसे 2022 के बाद से दो बार अपडेट किया गया है और अब इसमें 523 दवाएं शामिल हैं। वकालत समूह सुझाव देते हैं कि भारतीय सूची को इन वैश्विक मानकों के अनुरूप लाने से स्वास्थ्य समानता में सुधार होगा और सस्ती, उच्च-गुणवत्ता वाली दवाओं की उपलब्धता बढ़ेगी।
आगे की राह
यदि सरकार NLEM को अपडेट करने का निर्णय लेती है, तो इस प्रक्रिया में स्वास्थ्य विशेषज्ञों, चिकित्सा संघों और दवा उद्योग के प्रतिनिधियों के साथ व्यापक परामर्श शामिल होगा। सूची के किसी भी संभावित विस्तार से ऑन्कोलॉजी (oncology) और विशेष दवाओं के उत्पादन में शामिल कंपनियों के राजस्व मॉडल प्रभावित हो सकते हैं। निवेशक और उद्योग विश्लेषक स्वास्थ्य मंत्रालय और ICMR से आधिकारिक संचार पर नजर रखेंगे कि क्या कोई औपचारिक समीक्षा समिति गठित की जाती है। इस तरह के संशोधनों की समय-सीमा अक्सर कई महीनों तक फैली होती है, क्योंकि सरकार को मरीजों के लिए सामर्थ्य के लक्ष्यों और दवा नवाचार और आपूर्ति के लिए एक स्थायी वातावरण बनाए रखने की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाना होता है।
