भारत में पहली बार 'कंपल्सरी लाइसेंस' का ऐतिहासिक आदेश देने वाले पूर्व पेटेंट कंट्रोलर PH Kurian का **67** वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उनके एक फैसले ने Natco Pharma को सस्ती दवा बनाने का रास्ता दिया था, लेकिन आज कंपनी **₹2,000 करोड़** फंड जुटाने और रेवेन्यू में भारी गिरावट जैसी चुनौतियों से जूझ रही है।
पूर्व पेटेंट, डिजाइन और ट्रेडमार्क कंट्रोलर जनरल PH Kurian ने 26 अगस्त, 2026 को 67 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। एक अनुभवी IAS अधिकारी के तौर पर, उन्हें साल 2012 के उस फैसले के लिए याद किया जाता है, जिसने भारतीय फार्मा जगत की तस्वीर बदल दी थी। उस समय उन्होंने कैंसर की दवा 'Nexavar' के लिए भारत का पहला 'कंपल्सरी लाइसेंस' जारी किया था, जिसका पेटेंट मल्टीनेशनल कंपनी Bayer के पास था।
कैसे बदली दवा बाजार की चाल
Kurian के इस आदेश ने हैदराबाद स्थित Natco Pharma को उस महंगी दवा का जेनेरिक वर्जन बनाने की अनुमति दी। इस कदम का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ा—दवा का मासिक इलाज का खर्च ₹2.8 लाख से घटकर मात्र ₹8,800 रह गया। यह जनस्वास्थ्य और बौद्धिक संपदा अधिकारों के बीच संतुलन का एक बड़ा उदाहरण बना।
Natco Pharma: पुराने गौरव से मौजूदा संघर्ष तक
Natco Pharma के लिए 2012 का वह लाइसेंस मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने उन्हें ऑन्कोलॉजी (Oncology) और स्पेशलिटी ड्रग सेगमेंट में स्थापित किया। हालांकि, बीते 14 सालों में फार्मा सेक्टर का मिजाज पूरी तरह बदल चुका है। आज कंपनी का बिजनेस मॉडल काफी वोलेटाइल (अस्थिर) हो गया है। कंपनी के हालिया फाइनेंशियल रिपोर्ट (FY2027 की पहली तिमाही) में रेवेन्यू में 44% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। कंपनी की कमाई अब स्थिर वॉल्यूम के बजाय चुनिंदा जेनेरिक अवसरों पर ज्यादा निर्भर है।
क्या है भविष्य की रणनीति?
अपनी इस वोलेटिलिटी को कम करने के लिए Natco Pharma ने अब अपनी स्ट्रैटेजी बदली है। कंपनी ने Qualified Institutional Placement (QIP) के जरिए ₹2,000 करोड़ जुटाने की योजना बनाई है, ताकि नए अधिग्रहण किए जा सकें और क्षमताओं का विस्तार हो सके।
बाजार के जानकारों की नजर अब कंपनी के 'एक्जीक्यूशन रिस्क' पर है। 27 अगस्त, 2026 तक कंपनी का शेयर लगभग ₹857.60 के स्तर पर ट्रेड कर रहा था। अब निवेशक यह देख रहे हैं कि कंपनी कैसे अपने फंड का सही इस्तेमाल करके बिजनेस को डायवर्सिफाई करती है और रेवेन्यू में स्थिरता लाती है।
