ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने अपने नए इबोला वैक्सीन कैंडिडेट (Bundibugyo Ebola vaccine candidate) के लिए इंसानों पर पहले चरण की टेस्टिंग (Phase 1 trials) शुरू कर दी है। इस पहल का समर्थन करने के लिए सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (Serum Institute of India) ने **620,000** डोज़ का निर्माण किया है।
इबोला के खिलाफ जंग में नया कदम
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने ChAdOx1 BDBV नाम के एक नए वैक्सीन कैंडिडेट पर इंसानों के लिए टेस्टिंग शुरू कर दी है। यह खास तौर पर Bundibugyo Ebola वायरस को निशाना बनाने के लिए बनाया गया है। यह फेज 1 ट्रायल 50 स्वस्थ वालंटियर्स (18 से 55 साल के बीच) पर किया जा रहा है और यह पहली बार है जब वायरस के इस खास स्ट्रेन के लिए कोई वैक्सीन इंसानी क्लिनिकल जांच में पहुंची है।
सीरम इंस्टीट्यूट का बड़ा योगदान
यह वैक्सीन वायरल वेक्टर टेक्नोलॉजी (viral vector technology) का इस्तेमाल करती है, वही प्लेटफॉर्म जिस पर ऑक्सफोर्ड/एस्ट्राजेनेका की COVID-19 वैक्सीन बनी थी। इसी स्थापित टेक्नोलॉजी पर भरोसा करते हुए, रिसर्चर डेवलपमेंट की टाइमलाइन को तेज़ करने का लक्ष्य रख रहे हैं। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) ने प्रोडक्शन में अहम भूमिका निभाई है, जिसने करीब 620,000 डोज़ का निर्माण किया है। जहां क्लिनिकल ट्रायल के लिए फिलहाल 4,000 डोज़ रखे गए हैं, वहीं बाकी स्टॉक को तैयार रखा गया है ताकि अगर वैक्सीन अपनी सुरक्षा और असरदारिता की जांच में पास हो जाती है, तो तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सके।
वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए अहम
Bundibugyo Ebola वायरस को एक बड़ी स्वास्थ्य चिंता माना जाता है, क्योंकि यह अब तक के तीसरे सबसे बड़े इबोला प्रकोप के लिए जिम्मेदार है। इस प्रोजेक्ट को एपिडेमिक प्रिपेडनेस इनोवेशंस (CEPI) के गठबंधन से $8.6 मिलियन का वित्तीय सहयोग मिला है, जिसने कैंडिडेट को रिसर्च से टेस्टिंग स्टेज तक पहुंचाने में मदद की है।
सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के लिए, यह प्रोजेक्ट वैश्विक वैक्सीन मैन्युफैक्चरिंग पार्टनरशिप में अपनी निरंतर भूमिका को दर्शाता है, खासकर एक्सपेरिमेंटल वैक्सीन्स के बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन के लिए। निवेशकों और विशेषज्ञों की नज़र में, ऐसी पार्टनरशिप किसी कंपनी की जटिल, बड़े पैमाने की मेडिकल मैन्युफैक्चरिंग को संभालने की ऑपरेशनल क्षमता का एक इंडिकेटर है। हालांकि, ऐसी वैक्सीन्स की कमर्शियल व्यवहार्यता आमतौर पर अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियों के कॉन्ट्रैक्ट और इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट की ज़रूरतों पर निर्भर करती है। इस प्रोजेक्ट का अगला चरण इन शुरुआती 50 प्रतिभागियों से मिले डेटा की समीक्षा करना होगा ताकि वैक्सीन की सुरक्षा और जनरेट हुई इम्यून रिस्पॉन्स का पता लगाया जा सके।
