भारत में हर साल **32,000** से अधिक गरीब परिवार बच्चों के कैंसर इलाज के लिए बड़े शहरों का रुख करते हैं, लेकिन वहां रहने की सही जगह न मिल पाना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
भारत के महानगरों में बच्चों के इलाज के लिए आने वाले हजारों परिवारों के सामने केवल मेडिकल खर्च ही नहीं, बल्कि सिर छुपाने की जगह मिलना भी एक बड़ी जंग है। चूंकि बच्चों के कैंसर की विशेष सुविधाएं चुनिंदा शहरों में ही केंद्रित हैं, इसलिए दूर-दराज के इलाकों से आने वाले परिवारों को लंबे समय तक शहर में रहना पड़ता है। यह पलायन न केवल उनकी जेब पर भारी पड़ता है, बल्कि रहने के लिए असुरक्षित और भीड़भाड़ वाली जगहें बच्चों के स्वास्थ्य के लिए और भी खतरनाक साबित होती हैं।
क्यों छूट रहा है इलाज?
इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज्ड (Immunocompromised) बच्चों को बहुत ही स्वच्छ वातावरण की जरूरत होती है। रेलवे स्टेशनों या असुरक्षित लॉज में रहने से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। जब रहने और खाने का खर्च असहनीय हो जाता है, तो कई परिवार बीच में ही इलाज छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं।
बदल रही है तस्वीर: St. Jude India ChildCare Centres का मॉडल
St. Jude India ChildCare Centres जैसी संस्थाएं इस कमी को दूर करने के लिए 'होम्स अवे फ्रॉम होम' (Homes away from home) मॉडल पर काम कर रही हैं। ये संस्थाएं मुफ्त में सुरक्षित आवास, पौष्टिक भोजन, और काउंसिलिंग जैसी सुविधाएं देती हैं। इसका असर आंकड़ों में भी साफ दिखता है: इन प्रयासों के चलते इलाज बीच में छोड़ने (Dropout rate) की दर 30% से घटकर 5% से भी कम रह गई है।
CSR का अहम रोल
अब यह केवल समाज सेवा का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि भारत में Corporate Social Responsibility (CSR) के तहत बड़ी कंपनियां और हेल्थकेयर फर्म्स भी इन आवासीय केंद्रों को फंड कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इलाज की सफलता के लिए मेडिकल ट्रीटमेंट के साथ-साथ परिवार को एक स्थिर छत मुहैया कराना भी उतना ही जरूरी है, जितना कि कीमोथेरेपी या अन्य इलाज। भविष्य में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ इस तरह के सपोर्ट सिस्टम का विस्तार ही कैंसर मैनेजमेंट की सफलता की चाबी होगी।
