जेनेरिक दवाइयों से मुकाबला
Novo Nordisk, जो कि एक डेनिश फार्मास्युटिकल कंपनी है, भारत के तेजी से बढ़ते लेकिन प्राइस-सेंसिटिव (price-sensitive) मार्केट में अपने मार्केट शेयर (market share) को बचाने के लिए अपनी सामान्य हाई-प्राइस (high-price) स्ट्रेटेजी से हटकर बड़ा कदम उठा रही है। वर्तमान में Ozempic की एक महीने की कीमत ₹8,800 से ₹11,175 के बीच है, लेकिन नई कीमतों के तहत यह लगभग ₹5,000-₹6,000 तक आ सकती है।
यह नई कीमत भारतीय कंपनियों की जेनेरिक दवाओं से मुकाबले के लिए है। Sun Pharmaceuticals (सन फार्मा), Dr. Reddy's Laboratories (डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज), और Zydus Lifesciences (जायडस लाइफसाइंसेज) जैसी कंपनियां पहले ही सेमाग्लूटाइड की जेनेरिक दवाएं बाजार में उतार चुकी हैं। उदाहरण के लिए, Dr. Reddy's की Obeda की कीमत ₹4,200 प्रति माह है, जबकि Sun Pharma के वीकली ऑप्शन ₹750 से ₹2,000 तक में उपलब्ध हैं। Eris Lifesciences (एरिस लाइफसाइंसेज) और Natco Pharma (नैटको फार्मा) जैसी कंपनियां तो ₹1,290 प्रति माह जितनी कम कीमत पर भी दवाएं बेच रही हैं। भारत में डायबिटीज (diabetes) और मोटापे (obesity) के बढ़ते मामलों को देखते हुए यह प्राइस वॉर (price war) और तेज होने की उम्मीद है।
बढ़ता भारतीय जीएलपी-1 (GLP-1) मार्केट
भारत में जीएलपी-1 दवाओं का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। यह अनुमान है कि 2025 में ₹1,000–₹1,200 करोड़ का यह बाजार 2030 तक बढ़कर ₹4,500–₹5,000 करोड़ का हो जाएगा। 'डायबिटीज कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड' कहे जाने वाले भारत में टाइप 2 डायबिटीज और मोटापे की बढ़ती दरें इस ग्रोथ को बढ़ावा दे रही हैं।
कीमत घटाने के खतरे
Ozempic की कीमत में इतनी बड़ी कटौती से Novo Nordisk के प्रॉफिट मार्जिन (profit margins) पर असर पड़ने की आशंका है। कंपनी की प्रीमियम इमेज (premium image) भी प्रभावित हो सकती है। भारत में नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) और ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) जैसे नियम दवाओं की पहुंच को सुलभ बनाए रखने का लक्ष्य रखते हैं। पेटेंट एक्सपायरी के बाद जेनेरिक दवाओं का तेजी से बाजार में आना, भविष्य में पेटेंट धारकों की मूल्य निर्धारण शक्ति (pricing power) को कमजोर कर सकता है।