कैंसर दवाओं की कीमतों को लेकर Novartis और Eli Lilly ने केरल हाई कोर्ट में चल रही याचिका का विरोध किया है। मामला ब्रेस्ट कैंसर की दवाओं Ribociclib और Abemaciclib की महंगी कीमतों से जुड़ा है, जो MNC फार्मा कंपनियों के लिए रेगुलेटरी रिस्क बन सकता है।
मल्टीनेशनल फार्मा कंपनियां Novartis और Eli Lilly फिलहाल केरल हाई कोर्ट में एक कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। यह याचिका ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं 'Ribociclib' और 'Abemaciclib' की कीमतों को सरकारी हस्तक्षेप के जरिए कम करने के लिए दायर की गई है। यह मामला इस बात पर सवाल उठा रहा है कि विदेशी कंपनियां भारत में अपनी पेटेंटेड दवाओं की कीमत कैसे तय करती हैं।
ग्लोबल रेवेन्यू बनाम भारतीय मार्केट
कोर्ट में पेश किए गए आंकड़ों से ग्लोबल सफलता और भारतीय बाजार की स्थिति के बीच का भारी अंतर सामने आया है। Novartis की दवा Ribociclib ने 2020-2025 के बीच $12.7 बिलियन का ग्लोबल रेवेन्यू कमाया, जबकि भारत का हिस्सा केवल $55.7 मिलियन (लगभग 0.4%) रहा। इसी तरह Eli Lilly की दवा Abemaciclib का ग्लोबल रेवेन्यू $19.6 बिलियन रहा, जबकि भारत में यह केवल $31.5 मिलियन था।
प्रोडक्शन कॉस्ट और आरएंडडी (R&D) की दलील
विवाद का मुख्य केंद्र कीमतों में पारदर्शिता है। कंपनियां तर्क दे रही हैं कि हाई प्राइस रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) की लागत निकालने के लिए जरूरी है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने इसे चुनौती दी है। डेटा के मुताबिक, Ribociclib की मंथली प्रोडक्शन कॉस्ट ₹5,100 से ₹7,750 के बीच हो सकती है, जबकि इसे ₹78,400 के आसपास बेचा जा रहा है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
फार्मा सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए यह मामला काफी महत्वपूर्ण है। भारत की नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) पहले से ही 'ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर' (DPCO) के तहत कीमतों को रेगुलेट करती है। अगर कोर्ट ने कीमतों को कम करने का फैसला सुनाया, तो भारत में काम करने वाली MNC फार्मा कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर बुरा असर पड़ सकता है। निवेशकों को आने वाली कोर्ट की सुनवाई और सरकार के रुख पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि यह भविष्य में अन्य ऑनकोलॉजी दवाओं की कीमतों पर भी असर डाल सकता है।
