भारत में 'वॉच' एंटीबायोटिक्स का ज़्यादा इस्तेमाल? लैंसेट की स्टडी ने जताई चिंता

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारत में 'वॉच' एंटीबायोटिक्स का ज़्यादा इस्तेमाल? लैंसेट की स्टडी ने जताई चिंता

भारत में एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल को लेकर एक बड़ी चिंता सामने आई है। लैंसेट पब्लिक हेल्थ में छपी एक नई स्टडी के अनुसार, देश में एंटीबायोटिक दवाओं की खपत तय स्तर से ज़्यादा है, खासकर 'वॉच' कैटेगरी की दवाओं का। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों पर दबाव डाल सकता है और घरेलू दवा निर्माताओं के फोकस को भी प्रभावित कर सकता है।

Detailed Coverage

क्या है 'वॉच' कैटेगरी की दवाएं?

लैंसेट पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक हालिया विश्लेषण ने भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती को उजागर किया है: 'वॉच' कैटेगरी की एंटीबायोटिक्स का अत्यधिक उपयोग। ये दवाएं विशेष, गंभीर संक्रमणों के लिए आरक्षित हैं, लेकिन इनका व्यापक उपयोग वैश्विक स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए एक बढ़ती चिंता का विषय है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance) को बढ़ावा दे सकता है, जहाँ बैक्टीरिया सामान्य उपचारों का विरोध करने के लिए विकसित हो जाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) एंटीबायोटिक्स को तीन समूहों में वर्गीकृत करता है: 'एक्सेस', 'वॉच', और 'रिजर्व'। 'एक्सेस' एंटीबायोटिक्स सामान्य संक्रमणों के लिए पहली पंक्ति का उपचार हैं। 'वॉच' एंटीबायोटिक्स सीमित संक्रमणों के लिए होती हैं, जबकि 'रिजर्व' दवाएं खतरनाक, मल्टी-ड्रग रेसिस्टेंट (multi-drug resistant) रोगाणुओं के लिए केवल अंतिम उपाय के रूप में उपयोग की जाती हैं। स्टडी में यह भी कहा गया है कि एक स्थायी स्वास्थ्य प्रणाली के लिए, एंटीबायोटिक उपयोग का अधिकांश हिस्सा 'एक्सेस' समूह से आना चाहिए।

भारत में एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल

इस शोध में प्रति 1,000 निवासियों प्रति दिन परिभाषित दैनिक खुराक (Defined Daily Dose - DID) के मीट्रिक का उपयोग करके एंटीबायोटिक उपयोग का आकलन किया गया। भारत के लिए, अध्ययन ने 18.3 DID के वास्तविक एंटीबायोटिक उपयोग की गणना की, जो शोधकर्ताओं द्वारा अनुमानित 9.9 से 14.7 DID की इष्टतम सीमा से अधिक है। खास बात यह है कि इस कुल खपत में 9.3 DID 'वॉच' एंटीबायोटिक्स का था, जबकि केवल 4.5 DID 'एक्सेस' श्रेणी से आया। यह पैटर्न दर्शाता है कि भारत में एंटीबायोटिक प्रिस्क्राइबिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ऐसी दवाओं पर निर्भर करता है जिनका उपयोग अधिक चुनिंदा रूप से किया जाना चाहिए।

निवेशकों और फार्मा सेक्टर पर असर

निवेशकों के लिए, यह अध्ययन भारतीय फार्मास्युटिकल सेक्टर के लिए नियामक और मांग वातावरण में संभावित बदलावों को रेखांकित करता है। संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक निकाय अधिक जिम्मेदार एंटीबायोटिक प्रबंधन (antibiotic stewardship) को बढ़ावा दे रहे हैं - जिसका लक्ष्य 2030 तक 70% उपयोग 'एक्सेस' दवाओं से आना है - ऐसे में भारत सरकार 'वॉच' और 'रिजर्व' एंटीबायोटिक्स की बिक्री, प्रिस्क्रिप्शन और निर्माण पर सख्त दिशानिर्देश पेश कर सकती है।

'वॉच' एंटीबायोटिक पोर्टफोलियो पर अधिक निर्भर कंपनियों को उत्पाद मिश्रण और मूल्य निर्धारण के संबंध में भविष्य में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, अगर राष्ट्रीय नीतियां 'एक्सेस' दवाओं के पक्ष में उनके उपयोग को सीमित करती हैं। इसके विपरीत, जो निर्माता आवश्यक 'एक्सेस' एंटीबायोटिक्स सहित एक संतुलित पोर्टफोलियो को प्राथमिकता देते हैं, वे स्थिर दीर्घकालिक मांग देख सकते हैं क्योंकि देश अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य लक्ष्यों के साथ तालमेल बिठा रहा है। निवेशक भविष्य में स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देशों या दवा नियंत्रण नियमों में बदलावों पर नजर रख सकते हैं, क्योंकि ये एंटीबायोटिक बाजार में भारी जोखिम वाली कंपनियों के विकास की गति और मार्जिन प्रोफाइल को प्रभावित कर सकते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.