दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए 'भावनात्मक स्वास्थ्य' पर न्यूरोलॉजिस्ट की सलाह

HEALTHCAREBIOTECH
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए 'भावनात्मक स्वास्थ्य' पर न्यूरोलॉजिस्ट की सलाह

दिमाग को सेहतमंद रखने के लिए सिर्फ अच्छा खान-पान और कसरत ही काफी नहीं है। न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. जिंसी एंड्रयूज का कहना है कि भावनात्मक सेहत, यानी अच्छे सामाजिक संबंध और तनाव का सही प्रबंधन, दिमाग को तंदुरुस्त रखने का एक अहम हिस्सा है। रिसर्च बताती है कि अकेलेपन और लगातार बने रहने वाले तनाव को कम करना, याददाश्त कमजोर होने और डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) के खतरे को कम करने के लिए बहुत ज़रूरी है।

दिमागी सेहत में 'भावनात्मक स्वास्थ्य' का बढ़ता महत्व

जहाँ एक ओर लोग अपने शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए संतुलित खान-पान और नियमित व्यायाम पर ध्यान देते हैं, वहीं अब एक्सपर्ट्स लंबे समय तक दिमाग को ठीक रखने में भावनात्मक स्वास्थ्य की अहम भूमिका पर ज़ोर दे रहे हैं। NYU लैंगोन में न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. जिंसी एंड्रयूज इस बात पर जोर देती हैं कि भावनात्मक स्थिति सिर्फ एक छोटा-मोटा मसला नहीं है, बल्कि यह संज्ञानात्मक हानि (cognitive impairment), जिसमें अल्जाइमर रोग भी शामिल है, से बचाने के लिए एक बुनियादी चीज़ है।

सामाजिक जुड़ाव की क्वालिटी और डिमेंशिया का खतरा

रिसर्च से पता चलता है कि अकेलापन और लंबे समय से चला आ रहा डिप्रेशन (अवसाद) दिमाग से जुड़ी बीमारियों के बड़े ख़तरे हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि सामाजिक मेलजोल की असल अहमियत इस बात पर निर्भर करती है कि वो मेलजोल कितना गहरा और सच्चा है, न कि सिर्फ कितनी बार हुआ। टेक्नोलॉजी हमें जुड़े रहने के तरीके तो देती है, लेकिन सिर्फ डिजिटल माध्यमों से किया जाने वाला संपर्क शायद उतने फायदे न दे सके जितने कि गहरे, मतलब भरे इंसानी रिश्ते देते हैं। जब सामाजिक बातचीत ऊपरी या नकारात्मक हो जाती है, तो वे शायद उच्च-गुणवत्ता वाले सामाजिक जुड़ाव से मिलने वाले सुरक्षात्मक मानसिक लाभ प्रदान न कर पाएं।

नई चीज़ों से दिमाग को बनाएं मज़बूत

दिमाग की प्लास्टिसिटी (plasticity) यानी नई कनेक्शन्स बनाने की क्षमता, सिर्फ दिमागी खेल या पहेलियों को बार-बार हल करने पर ही निर्भर नहीं करती। बल्कि, रोज़मर्रा की ज़िंदगी में तरह-तरह के नए अनुभव शामिल करना ज़्यादा असरदार हो सकता है। जैसे कि कोई नई कला सीखना, अलग-अलग तरह की किताबें पढ़ना, या संगीत जैसी गतिविधियों में शामिल होना दिमाग को अलग-अलग तरह की जानकारी के अनुकूल होने के लिए मजबूर करता है। यह विविधता दिमाग के अलग-अलग हिस्सों को उत्तेजित करती है, जिससे किसी एक तरह के मानसिक काम पर ध्यान केंद्रित करने की तुलना में संज्ञानात्मक गिरावट के खिलाफ़ एक ज़्यादा मज़बूत बचाव तैयार होता है।

लगातार तनाव का दिमाग की बनावट पर असर

लगातार बने रहने वाले तनाव का सीधा असर हमारे नर्वस सिस्टम पर पड़ता है और समय के साथ उसे नुकसान पहुंचा सकता है। लगातार तनाव के दौरान शरीर में सूजन (inflammation) के बढ़े हुए मार्कर पाए जाते हैं, जो दिमाग के कुल वॉल्यूम में कमी से जुड़े होते हैं। तनाव कम करने वाली गतिविधियों को अपनी दिनचर्या में शामिल करके, लोग इन सूजन वाले प्रभावों को कुछ हद तक कम कर सकते हैं। आराम देने वाली चीज़ों में शामिल होना सिर्फ़ मानसिक सुकून के लिए नहीं है; यह एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है जो ज़्यादा तनाव वाले माहौल में दिमाग की बनावट और कामकाज को बनाए रखने में मदद कर सकता है। हेल्थकेयर और लाइफ साइंसेज सेक्टर पर नज़र रखने वाले निवेशक यह देख सकते हैं कि निवारक कल्याण (preventive wellness) की रणनीतियाँ आधुनिक चिकित्सा अनुसंधान और सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही हैं।

Disclaimer:This article is published for informational purposes only. While reasonable efforts are made to ensure accuracy, completeness, and timeliness, readers are encouraged to independently verify information before making any decisions based on the content. The views and information presented are subject to editorial review and may be updated without notice.