NITI Aayog अब मेडिकल और डेंटल इक्विपमेंट के लिए नियम आसान करने की तैयारी कर रहा है। सरकार का मकसद इम्पोर्ट पर निर्भरता कम करना और घरेलू कंपनियों को **10-15%** की लागत के नुकसान से उबारना है।
मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की तैयारी
भारत को एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए NITI Aayog ने मेडिकल और डेंटल डिवाइस सेक्टर की औपचारिक समीक्षा शुरू कर दी है। इस समीक्षा में Department of Pharmaceuticals, Indian Council of Medical Research (ICMR), और IIT Delhi व IIT Mumbai के एक्सपर्ट्स शामिल हैं। सरकार का फोकस इम्पोर्ट पर निर्भरता को कम करना है, जो फिलहाल देश की कुल मेडिकल इक्विपमेंट खपत का एक बड़ा हिस्सा है।
क्यों पिछड़ रही हैं घरेलू कंपनियां?
Association of Indian Medical Device Industry के अनुसार, घरेलू कंपनियों को इम्पोर्टेड प्रोडक्ट्स के मुकाबले 10-15% का लागत नुकसान उठाना पड़ता है। इसकी मुख्य वजहें महंगी ऊर्जा, जटिल लॉजिस्टिक्स और कैपिटल तक सीमित पहुंच हैं। साथ ही, रेगुलेटरी मंजूरियों में लगने वाला समय 18 महीने से बढ़कर अब लगभग 4 साल तक पहुंच गया है, जो बिजनेस के स्केल-अप में सबसे बड़ी बाधा है।
सरकार का नया प्लान
इन समस्याओं को हल करने के लिए सरकार एक डेडिकेटेड लेजिस्लेटिव फ्रेमवर्क (Legislative Framework) पर विचार कर रही है। अब मेडिकल डिवाइसेज को फार्मा रेगुलेशन के दायरे से बाहर निकालने की योजना है, क्योंकि इंडस्ट्री का मानना है कि डिवाइस टेक्नोलॉजी की जरूरतें फार्मा से अलग हैं।
निवेशकों के लिए संकेत
इन्वेस्टर्स के लिए यह बदलाव गेम-चेंजर हो सकता है। अगर अप्रूवल प्रोसेस सरल होता है और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधरता है, तो घरेलू कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन में सुधार की उम्मीद है। हालांकि, ग्लोबल MNCs की कड़ी प्रतिस्पर्धा एक चुनौती बनी रहेगी। निवेशकों को अब भविष्य में आने वाले सरकारी नोटिफिकेशन और फिस्कल इंसेंटिव्स (Fiscal Incentives) पर बारीक नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इसी से कंपनियों की अर्निंग्स में सुधार दिखाई देगा।
