भारत अब बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगाने की तैयारी में है। NITI Aayog ने 'BioPharmaNext' नाम से एक महत्वाकांक्षी मिशन लॉन्च किया है, जिसका लक्ष्य 2035 तक देश को एडवांस दवाइयों और बायोलॉजिक्स के लिए दुनिया का प्रमुख केंद्र बनाना है। यह मिशन जीन थेरेपी और सेल थेरेपी जैसे बढ़ते बाज़ारों पर फोकस करेगा, साथ ही AI का उपयोग करके दवा खोजने की लागत को भी कम करेगा।
भारत को क्यों बनाया जा रहा है ग्लोबल हब?
NITI Aayog द्वारा पेश किया गया यह 'BioPharmaNext' मिशन एक रोडमैप है जो भारत को जेनरेशन-नेक्स्ट मेडिसिन मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक प्रमुख डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित करेगा। 2035 तक, इस मिशन के तहत घरेलू इंडस्ट्री को जेनेरिक दवाओं से हटकर जीन थेरेपी, सेल थेरेपी और मोनोक्लोनल एंटीबॉडी जैसे हाई-वैल्यू सेगमेंट्स की ओर ले जाने का लक्ष्य है।
बायोलॉजिक्स के ग्लोबल बाज़ार पर कब्ज़ा
बायोलॉजिक्स, जो जीवित जीवों से बनी दवाइयां हैं, हेल्थकेयर सेक्टर में एक बड़ा ग्रोथ एरिया हैं। इस मिशन का उद्देश्य भारतीय कंपनियों को इस बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने में मदद करना है। अनुमान है कि 2035 तक ग्लोबल दवा बिक्री का लगभग 40% हिस्सा बायोलॉजिक्स का होगा। 2030 तक लगभग $300 बिलियन की बायोलॉजिक दवाओं के पेटेंट एक्सपायर होने वाले हैं, जिससे भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए इन दवाओं के सस्ते बायोसिमिलर वर्जन विकसित करने और बनाने का एक बड़ा मौका खुलेगा। इससे उन्हें घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में रेवेन्यू बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
AI का इस्तेमाल और आर्थिक प्रभाव
पारंपरिक मैन्युफैक्चरिंग के अलावा, यह मिशन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर भी ज़ोर दे रहा है। NITI Aayog की रिपोर्ट के अनुसार, दवा खोजने की प्रक्रिया में AI को इंटीग्रेट करने से रिसर्च कॉस्ट 20-30% तक कम हो सकती है और डेवलपमेंट टाइमलाइन 60-80% तक कम हो सकती है। आर्थिक रूप से, यह कदम बहुत महत्वपूर्ण है। 2030 तक $73-76 बिलियन के अनुमानित ग्लोबल बायोसिमिलर मार्केट का सिर्फ 1% हिस्सा भी भारत के लिए सालाना लगभग ₹6,400 करोड़ का रेवेन्यू ला सकता है। यह इनोवेशन की ओर बदलाव कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन में सुधार कर सकता है, क्योंकि वे कम मार्जिन वाले जेनेरिक ड्रग्स के बाज़ार से बाहर निकलेंगी।
चुनौतियां और इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरतें
लंबे समय के पोटेंशियल के बावजूद, रिपोर्ट में कुछ बड़ी चुनौतियां और बाधाएं भी बताई गई हैं जो मिशन के कार्यान्वयन की गति को प्रभावित कर सकती हैं। फिलहाल, भारत में नई दवाओं के रेगुलेटरी अप्रूवल में 900 दिनों तक का समय लग सकता है, जो कई ग्लोबल प्रतियोगियों से काफी पीछे है। इसके अलावा, इंडस्ट्री को कुशल शोधकर्ताओं की कमी, सीमित हाई-परफॉरमेंस कंप्यूटिंग सुविधाओं और अविकसित क्लिनिकल ट्रायल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
इन मुद्दों को हल करने के लिए, सरकार एडवांस दवाओं के लिए एक फास्ट-ट्रैक अप्रूवल सिस्टम और पांच डेडिकेटेड बायोइनोवेशन हब बनाने पर विचार कर रही है। इन हब का मकसद अकादमिक रिसर्च, स्टार्टअप्स और स्थापित फार्मा कंपनियों के बीच की खाई को पाटना है। निवेशकों को इन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के कार्यान्वयन पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि मिशन की सफलता सरकार की रेगुलेशंस को सुव्यवस्थित करने और आवश्यक कंप्यूटिंग संसाधन प्रदान करने की क्षमता पर निर्भर करेगी। घरेलू स्तर पर उत्पादित बायोलॉजिक्स के लिए प्रोक्योरमेंट नीतियों (खरीद नीतियों) और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की गति पर भविष्य के अपडेट्स इस बात के मुख्य संकेतक होंगे कि कंपनियां इस हाई-टेक सेक्टर में कितनी तेज़ी से अपने ऑपरेशंस को बढ़ा सकती हैं।
