भारतीय डायग्नोस्टिक्स मार्केट अगले पांच सालों में **10-15%** की रफ्तार से बढ़ने की उम्मीद है, जिसकी वजह लोगों का हेल्थ के प्रति बढ़ता रुझान है। इसी बीच, Molbio Diagnostics का IPO दूसरे दिन तक **3.11 गुना** सब्सक्राइब हो गया है। हालांकि, निवेशकों को कंपनी के सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स पर ज़्यादा निर्भरता और टीबी (TB) डायग्नोस्टिक किट से होने वाली कमाई पर गौर करना होगा।
डायग्नोस्टिक्स मार्केट में बूम!
भारत का डायग्नोस्टिक्स मार्केट तेजी से बदल रहा है। अनुमान है कि अगले पांच सालों में यह 10-15% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ेगा। इसकी बड़ी वजह क्रॉनिक बीमारियों का बढ़ना और प्रीवेंटिव हेल्थ चेकअप के प्रति लोगों का बढ़ता नजरिया है। खास तौर पर छोटे शहरों (Tier 2 और Tier 3 cities) में यह ट्रेंड ज़ोरों पर है। जैसे-जैसे सेक्टर बड़ा हो रहा है, छोटे और असंगठित लैब्स बड़ी कंपनियों के साथ जुड़ रहे हैं, जिससे इंडस्ट्री को और बढ़ावा मिलेगा।
Molbio Diagnostics IPO: निवेशकों का भरोसा
इसी सेक्टर के एक अहम प्लेयर, Molbio Diagnostics ने 10 अगस्त 2026 को अपना IPO लॉन्च किया था। कंपनी ₹939.70 करोड़ जुटाने की कोशिश में है, जिसके लिए शेयर की कीमत ₹768 से ₹807 के बीच रखी गई है। 11 अगस्त 2026 तक, यानी दूसरे दिन के अंत तक, IPO को 3.11 गुना का शानदार सब्सक्रिप्शन मिल चुका है। रिटेल इन्वेस्टर्स और नॉन-इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (NIIs) ने इसमें खास दिलचस्पी दिखाई है, जिनके लिए सब्सक्रिप्शन क्रमश: 3.18 गुना और 5.21 गुना रहा। यह IPO 12 अगस्त को बंद होगा और 17 अगस्त 2026 को NSE और BSE पर लिस्ट हो सकता है।
Molbio पॉइंट-ऑफ-केयर डायग्नोस्टिक्स में एक लीडिंग कंपनी है। इसका मतलब है कि टेस्टिंग सेंट्रलाइज्ड लैब्स के बजाय मरीज़ के करीब की जा सकती है। यह टेक्नोलॉजी तेज़ बीमारी का पता लगाने में मददगार है और हेल्थकेयर को ज़्यादा सुलभ बनाने के लक्ष्य में योगदान करती है।
निवेशकों के लिए जरूरी बातें (Risks)
सेक्टर का भविष्य भले ही उज्ज्वल दिख रहा हो, लेकिन निवेशकों को Molbio Diagnostics के IPO में पैसे लगाने से पहले कुछ बातों पर ज़रूर गौर करना चाहिए। कंपनी के प्रॉस्पेक्टस में एक बड़ी बात यह है कि इसकी कमाई का बड़ा हिस्सा कुछ गिने-चुने प्रोडक्ट्स से आता है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में कंपनी का करीब 70% रेवेन्यू सिर्फ ट्यूबरकुलोसिस (TB) डायग्नोस्टिक किट से आया था। इसका सीधा मतलब है कि कंपनी की आर्थिक स्थिति टीबी की दवाओं के बाजार पर बहुत ज़्यादा निर्भर करती है।
इसके अलावा, कंपनी सरकारी और अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियों के कॉन्ट्रैक्ट्स पर काफी निर्भर है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में इसके रेवेन्यू का लगभग 85% इन्हीं कॉन्ट्रैक्ट्स से आया था। ऐसे मॉडल में सरकारी नीतियों में बदलाव, फंडिंग में रुकावट या पब्लिक हेल्थ की प्राथमिकताओं में बदलाव का सीधा असर कंपनी की कमाई पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ, छोटे शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के चलते डायग्नोस्टिक्स सेक्टर में मार्जिन प्रेशर का खतरा भी बना हुआ है।
