Max Healthcare के चेयरमैन अभय सोई ने अस्पताल की प्राइसिंग पॉलिसी का बचाव किया है। उन्होंने साफ किया है कि बिल में सिर्फ दवाइयों की कीमत नहीं, बल्कि जटिल क्लिनिकल सर्विसेज का खर्च शामिल है। कंपनी के शेयर फिलहाल अपने 52-वीक लो के करीब कारोबार कर रहे हैं, जिसका कारण रेगुलेटरी दबाव और सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियां हैं।
प्राइसिंग पर अस्पताल का तर्क
Max Healthcare के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर अभय सोई ने कहा है कि निजी अस्पतालों को सिर्फ 'दवाई बेचने वाली दुकान' की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि बिल में दवाइयों के अलावा स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग, दवाओं के लिए क्लाइमेट-कंट्रोल स्टोरेज और बायोमेडिकल वेस्ट डिस्पोजल का खर्च भी जुड़ा होता है। सोई के अनुसार, बड़े हॉस्पिटल्स का नेट प्रॉफिट मार्जिन आमतौर पर 8% से 9% के बीच रहता है, जो पूरी सर्विसेज के ऑपरेशंस को मैनेज करने के लिए जरूरी है।
निवेशक क्यों हैं परेशान?
यह सफाई ऐसे समय में आई है जब पूरा हॉस्पिटल सेक्टर रेगुलेटरी जांच के घेरे में है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा निजी अस्पतालों में दवाओं पर अधिक मार्कअप को लेकर की गई टिप्पणियों के बाद सितंबर के अंत में सेक्टर में भारी बिकवाली देखी गई थी। Max Healthcare के शेयर भी दबाव में हैं और फिलहाल अपने 52-वीक लो के आसपास ट्रेड कर रहे हैं।
कंपनी की अपनी चुनौतियों में एक तरफ जहां रेगुलेटरी रिस्क है, वहीं दूसरी तरफ ₹6,000 करोड़ का बड़ा कैपिटल एक्सपेंडिचर प्लान भी है। कंपनी अपनी क्षमता को 2,800 नए बेड्स के साथ 10,000 बेड्स तक ले जाने की तैयारी कर रही है।
कानूनी पेंच और भविष्य की राह
निवेशकों के लिए एक चिंता का विषय सब्सिडियरी कंपनी 'Kalinga Hospital Ltd' से जुड़ा NCLT मामला भी है, जिसे BRS Capital ने शुरू किया है। निवेशकों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार अस्पतालों की प्राइसिंग पर कोई सख्त कैप लगाती है, जिससे मार्जिन पर असर पड़ सकता है। आने वाले क्वार्टरली रिजल्ट्स यह तय करेंगे कि क्या कंपनी का प्रॉफिट मार्जिन उम्मीदों के मुताबिक बना रहता है या रेगुलेटरी दबाव इनके परफॉर्मेंस को और प्रभावित करेगा।
