West Bengal के Malda Medical College and Hospital में अगस्त के महीने में **60** नवजातों की मौत ने हड़कंप मचा दिया है। स्वास्थ्य विभाग ने इस पूरे मामले की औपचारिक जांच शुरू कर दी है। हालांकि एक ही दिन में **10** मौतों की खबर ने चिंता बढ़ाई, लेकिन शुरुआती रिपोर्ट बताती है कि इनमें से अधिकांश बच्चे दूसरे अस्पतालों से गंभीर हालत में रेफर होकर आए थे।
रेफरल सिस्टम की चुनौतियां
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि यह मेडिकल कॉलेज पूरे इलाके के लिए एक प्रमुख 'हाई-एक्यूटी सेंटर' है, जिससे यहां मरीजों का दबाव हमेशा बना रहता है। उपलब्ध डेटा के अनुसार, जान गंवाने वाले 60 शिशुओं में से 44 का जन्म इस अस्पताल में नहीं हुआ था। इन्हें अन्य सरकारी क्लीनिकों या प्राइवेट नर्सिंग होम से रेफर किया गया था। डॉक्टरों के मुताबिक, ये बच्चे अस्पताल पहुँचने के समय ही बेहद नाजुक हालत में थे, जिनमें कंजेनिटल हार्ट डिफेक्ट, रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस और पीलिया जैसी गंभीर समस्याएं थीं।
सरकारी जांच और सिस्टम की पड़ताल
पश्चिम बंगाल सरकार अब इस पूरे मामले में मेडिकल आउटकम और पेशेंट रेफरल प्रोटोकॉल की गहन समीक्षा कर रही है। जांच का मुख्य केंद्र यह है कि आखिर पेरिफेरल हेल्थ सेंटर इन गंभीर मामलों को संभालने में नाकाम क्यों रहे, जिससे सेंट्रल मेडिकल कॉलेज पर मरीजों का अत्यधिक बोझ बढ़ गया। यह पैटर्न इस बात पर सवाल खड़े करता है कि क्या आसपास के इलाकों में इमरजेंसी नियोनेटल केयर की गुणवत्ता और रेफरल चेन प्रभावी तरीके से काम कर रही है या नहीं।
स्वास्थ्य विभाग ने अब एक व्यापक ऑडिट के आदेश दिए हैं, जिसमें मेडिकल रिकॉर्ड्स, ट्रायज प्रोसेस और संसाधनों के आवंटन की जांच की जाएगी। आने वाली रिपोर्ट यह तय करेगी कि क्या अस्पताल में स्टाफ की कमी थी या फिर सिस्टम की खामियों के कारण ये दुखद घटनाएं हुईं।
