भारतीय CDMO कंपनियां जैसे Laurus Labs और Piramal Pharma शानदार रेवेन्यू ग्रोथ दिखा रही हैं। ग्लोबल बायोटेक सेक्टर में रिकवरी का सीधा फायदा इन कंपनियों को मिल रहा है, जहां ट्रेडिशनल जेनरिक दवा बनाने वाली कंपनियों को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
भारतीय फार्मा सेक्टर में अब एक साफ विभाजन देखने को मिल रहा है। अमेरिका में जेनरिक दवाओं के गिरते दामों और बढ़ते दबाव के बीच, जो कंपनियां कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज यानी CDMO में काम कर रही हैं, वे तेजी से आगे बढ़ रही हैं। ग्लोबल मार्केट में अब स्पेशलाइज्ड और कॉम्प्लेक्स दवाओं की डिमांड बढ़ गई है, जिसका सीधा लाभ इन कंपनियों को मिल रहा है।
स्पेशलाइज्ड प्रोडक्शन से मिली ताकत
Laurus Labs और Piramal Pharma ने सितंबर तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया है। Laurus का रेवेन्यू 33% और Piramal Pharma का रेवेन्यू 28% बढ़ा है। इसका मुख्य कारण ग्लोबल बायोटेक फंडिंग में सुधार है। Piramal Pharma ने तो चालू फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही में ही 22 नए क्लाइंट्स को अपने साथ जोड़ा है।
खास बात यह है कि ये कंपनियां अब बेसिक कमोडिटी दवाओं से हटकर कॉम्प्लेक्स मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान दे रही हैं। Piramal Pharma का 43% रेवेन्यू अब एंटीबॉडी-ड्रग कॉन्जुगेट्स (ADC) जैसी हाई-वैल्यू सर्विसेज से आ रहा है। वहीं, Laurus Labs पेप्टाइड मैन्युफैक्चरिंग जैसे जटिल क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत कर रही है।
निवेश का जोखिम और चुनौतियां
इस ग्रोथ को पकड़ने के लिए इन कंपनियों ने भारी निवेश किया है। Laurus Labs ने अपनी कुल कमाई का करीब 20% हिस्सा नए इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाओं पर खर्च किया है। हालांकि, यह बिजनेस मॉडल जोखिम से खाली नहीं है।
इसमें प्रोडक्शन शुरू होने से कई साल पहले ही भारी पैसा खर्च करना पड़ता है। चूंकि ये कंपनियां दवाओं के डेवलपमेंट में पार्टनर के तौर पर काम करती हैं, इसलिए उनकी सफलता क्लाइंट्स की रिसर्च पाइपलाइन पर निर्भर करती है। यदि ग्लोबल बायोटेक सेक्टर में डिमांड सुस्त पड़ती है या प्रोडक्शन में देरी होती है, तो कंपनी के मार्जिन्स और कैश फ्लो पर दबाव बढ़ सकता है। निवेशकों के लिए अब इन कंपनियों की ऑर्डर बुक कन्वर्जन और नई फैसिलिटीज के बेहतर इस्तेमाल पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा।
