कोटा हॉस्पिटल में हाहाकार: 5 मरीज़ों ने ट्रांसप्लांट या इच्छामृत्यु की मांग की

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AuthorMehul Desai|Published at:
कोटा हॉस्पिटल में हाहाकार: 5 मरीज़ों ने ट्रांसप्लांट या इच्छामृत्यु की मांग की

राजस्थान के कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में एक गंभीर स्थिति पैदा हो गई है। यहाँ बच्चे के जन्म के बाद किडनी फेल होने से जूझ रही पांच महिलाएं अब डायलिसिस कराने से इनकार कर रही हैं। उन्होंने अस्पताल प्रशासन के सामने किडनी ट्रांसप्लांट या इच्छामृत्यु की मांग रखी है।

मेडिकल संकट की जड़ें

यह मामला मई 2026 की शुरुआत में हुई एक बड़ी स्वास्थ्य घटना से जुड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, JK Lon हॉस्पिटल और न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल दोनों में प्रसव के बाद बारह महिलाओं को गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं का सामना करना पड़ा था। इस घटना के बाद, पांच महिलाओं की मौत हो गई, जबकि दो अन्य ठीक हो गईं। वर्तमान में विरोध प्रदर्शन करने वाली पांच महिलाएं किडनी फेल होने के कारण लगातार इलाज करा रही हैं।

महिलाओं के परिवारों ने आरोप लगाया है कि 4 से 8 मई, 2026 के बीच प्रसव के दौरान हुई लापरवाही और गलत दवाएं देने के कारण ये मेडिकल दिक्कतें हुईं। यह परिवारों और अस्पताल प्रशासन के बीच एक बड़ा विवाद बन गया है, क्योंकि मरीज़ों का कहना है कि उनकी वर्तमान स्थिति पिछली मेडिकल विफलताओं का परिणाम है।

अस्पताल का पक्ष और क्लिनिकल प्रोटोकॉल

न्यू मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. निलेश जैन ने लापरवाही के आरोपों से साफ़ इंकार किया है। अस्पताल के अधिकारियों के अनुसार, मरीज़ वर्तमान में क्लिनिकली स्थिर हैं और उन्हें मुख्यमंत्री आयुष्मान योजना के तहत मुफ्त चिकित्सा सेवा मिल रही है।

ट्रांसप्लांट की मांग पर, अस्पताल प्रशासन ने समझाया है कि ऐसी किडनी की चोटों के बाद 3 से 6 महीने का एक मानक क्लिनिकल प्रतीक्षा काल होता है। इस अवधि में यह आकलन किया जाता है कि क्या मरीज़ के गुर्दे की कार्यप्रणाली में प्राकृतिक रूप से सुधार के संकेत दिख सकते हैं, इससे पहले कि यह तय किया जाए कि ट्रांसप्लांट की ज़रूरत है या नहीं। अस्पताल के अधिकारियों ने डायलिसिस जारी रखने पर ज़ोर दिया है, क्योंकि यह प्रक्रिया जीवन रक्षक है और इसे रोकने से मरीज़ों के स्वास्थ्य को गंभीर खतरा हो सकता है। अस्पताल ने यह भी कहा है कि यदि मरीज़ उपचार से इनकार करते हैं तो वे जिला प्रशासन को सूचित करेंगे।

आगे की राह

जिला प्रशासन और स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए मुख्य चुनौती मरीज़ों की मांगों और अस्पताल के क्लिनिकल प्रोटोकॉल के बीच संतुलन बनाना होगा। इस विवाद का समाधान कैसे होता है, विशेष रूप से इन सुविधाओं में मेडिकल प्रथाओं की आगे की जांच की संभावना को देखते हुए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

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