केरल हाई कोर्ट ने ब्रेस्ट कैंसर की दवा Ribociclib की अफोर्डेबिलिटी (अफोर्डेबिलिटी) की जांच के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने पेटेंट एक्ट के सेक्शन **100** के तहत सरकार को यह मूल्यांकन करने को कहा है, जो भविष्य में फार्मा सेक्टर के लिए एक बड़ा नजीर बन सकता है।
केरल हाई कोर्ट ने ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली अहम दवा Ribociclib की कीमत को लेकर बड़ा निर्देश जारी किया है। यह फैसला 2022 में दायर एक याचिका के बाद आया है, जिसमें दावा किया गया था कि दवा की महंगी कीमत मरीजों के लिए इलाज में बड़ी बाधा बनी हुई है। याचिका के समय, इस दवा के 21 दिन के ट्रीटमेंट का खर्च लगभग ₹58,140 था, जिसे मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए काफी बोझिल माना गया है।
पेटेंट एक्ट का सेक्शन 100 क्या है?
कोर्ट का यह फैसला पेटेंट एक्ट, 1970 के सेक्शन 100 की व्याख्या पर आधारित है। यह कानूनी प्रावधान सरकार को राज्य के उद्देश्यों के लिए किसी आविष्कार का उपयोग करने की शक्ति देता है। हालांकि, कोर्ट ने तुरंत किसी प्राइस कैप (Price Cap) का आदेश नहीं दिया है, बल्कि सरकारी अधिकारियों को एक औपचारिक डेटा कलेक्शन और मूल्यांकन प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है।
कैंसर केयर में दवाओं का अंतर
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि Ribociclib और Palbociclib चिकित्सकीय रूप से एक-दूसरे के विकल्प नहीं हैं। हालांकि Palbociclib भारत में कई मैन्युफैक्चरर्स द्वारा कम कीमत पर उपलब्ध है, लेकिन कोर्ट ने माना कि ये सभी मरीजों के लिए एक जैसा काम नहीं करतीं। यह स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे महंगी दवाओं के मामले में सस्ती दवाओं की उपलब्धता को ढाल बनाकर समीक्षा से बचने का रास्ता बंद हो गया है।
निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
फार्मा सेक्टर के निवेशकों के लिए यह घटनाक्रम पेटेंट अधिकार और आम लोगों की पहुंच के बीच के संतुलन को दर्शाता है। यदि सरकार की समीक्षा में दवा को 'अफोर्डेबल' नहीं पाया जाता है, तो भविष्य में सरकार कंपलसरी लाइसेंसिंग (Compulsory Licensing) या अन्य सख्त कदम उठा सकती है। चूंकि कोर्ट ने सरकार को कोई फिक्स डेडलाइन नहीं दी है, इसलिए बाजार की नजरें अब सरकारी स्वास्थ्य अधिकारियों के अगले कदम और डेटा कलेक्शन प्रक्रिया पर टिकी हैं।
