Kerala High Court ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि सरकार Patents Act के तहत महंगी लाइफ-सेविंग दवाओं की कीमतों में दखल दे सकती है। इसमें खास तौर पर कैंसर की दवाओं, जैसे abemaciclib और ribociclib का जिक्र किया गया है। कोर्ट के इस रुख से फार्मा सेक्टर में रेगुलेटरी सख्ती का संकेत मिल रहा है।
केरल हाई कोर्ट ने भारत में पेटेंटेड दवाओं की कीमतों को लेकर एक बड़ा कानूनी रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार के पास Patents Act की Section 100 के तहत यह अधिकार है कि वह जनहित में दवाओं की कीमतों और उनकी उपलब्धता को नियंत्रित कर सके। हालांकि अभी तुरंत कोई प्राइस कैप नहीं लगाया गया है, लेकिन कोर्ट ने अधिकारियों को देश भर में दवाओं की अफोर्डेबिलिटी (Affordability) का आकलन करने का निर्देश दिया है।
सरकार के पास क्या है अधिकार?
Patents Act की Section 100 के तहत सरकार को यह शक्ति मिलती है कि वह पेटेंट होल्डर की सहमति के बिना भी सरकारी उपयोग के लिए दवाओं के निर्माण को अधिकृत कर सकती है। कोर्ट ने इसे केवल राष्ट्रीय सुरक्षा तक सीमित न मानते हुए, इसे पब्लिक हेल्थ की रक्षा के लिए एक जरूरी कदम बताया है।
किन कंपनियों पर पड़ेगा असर?
यह मामला मुख्य रूप से मल्टीनेशनल फार्मा कंपनियों (MNCs) की हाई-वैल्यू कैंसर दवाओं से जुड़ा है। वर्तमान में Eli Lilly के पास abemaciclib का पेटेंट है, जबकि Novartis ribociclib की पेटेंट होल्डर है। ये दोनों दवाएं HR-पॉजिटिव और HER2-नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होती हैं। लंबे समय से इन दवाओं की ऊंची कीमतों को लेकर सवाल उठते रहे हैं, और अब कोर्ट के इस निर्देश से कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों को अब Ministry of Health के अगले कदमों पर कड़ी नजर रखनी होगी। यदि सरकार 'अफोर्डेबिलिटी' को लेकर कोई कड़े मानक (Thresholds) तय करती है, तो भविष्य में प्रीमियम ऑन्कोलॉजी दवाओं के बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। यह फैसला उन निवेशकों के लिए एक रिस्क फैक्टर है जो विदेशी फार्मा कंपनियों के स्टॉक्स पर दांव लगाए हुए हैं।
