कर्नाटक सरकार ने 1 नवंबर, 2026 से अस्पतालों के लिए नई गाइडलाइन्स जारी की हैं। अब अस्पतालों को हर मेडिकल आइटम की खरीद लागत (Acquisition Cost), MRP और मरीज से ली गई कीमत का खुलासा करना होगा, जिससे प्राइवेट हॉस्पिटल चेन्स के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
कर्नाटक फूड सेफ्टी एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन ने एक बड़ा फैसला लेते हुए राज्य के सभी प्राइवेट, पब्लिक और ट्रस्ट-रन अस्पतालों के लिए नया नियम लागू किया है। 1 नवंबर, 2026 से प्रभावी होने वाली इस व्यवस्था के तहत, अस्पतालों को अब मरीज को दिए जाने वाले हर मेडिकल आइटम और दवा के बिल में तीन चीजें अनिवार्य रूप से लिखनी होंगी: आइटम की खरीद लागत, उसकी MRP, और मरीज से ली गई फाइनल कीमत। इसका सीधा मकसद चिकित्सा क्षेत्र में चल रही अपारदर्शी बिलिंग और अत्यधिक मुनाफे पर लगाम लगाना है।
मुनाफे (Profit Margin) पर कितना बड़ा असर?
इन्वेस्टर्स के लिए चिंता का बड़ा कारण यह है कि कई हॉस्पिटल चेन्स अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा फार्मेसी सेल्स और महंगे मेडिकल कंज्यूमेबल्स से होने वाले मुनाफे से जुटाती हैं। 'लैंडिंग कॉस्ट' का खुलासा अनिवार्य होने से अस्पताल अब अपनी मनमानी मार्जिन नहीं रख पाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सेक्टर के ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है और कंपनियों को अपनी प्राइसिंग स्ट्रैटेजी बदलनी पड़ सकती है।
रेगुलेटरी दबाव और सेक्टर पर असर
यह फैसला केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मेडिकल बिलिंग में पारदर्शिता की मांग के बाद लिया गया है। इससे पहले भी Apollo Hospitals, Max Healthcare, और KIMS जैसे दिग्गज शेयरों ने ऐसी खबरों के प्रति काफी संवेदनशीलता दिखाई है। जब भी रेगुलेटरी कैप या मार्जिन पर नियंत्रण की बात आती है, मार्केट में इन शेयरों में उठापटक देखने को मिलती है।
ऑपरेशनल चुनौतियां और अनुपालन
नए नियमों के तहत, अस्पतालों को अपनी खरीद के बिल और विस्तृत रिकॉर्ड कम से कम 3 साल तक सुरक्षित रखने होंगे। डिस्ट्रिक्ट हेल्थ ऑफिसर इन नियमों की निगरानी करेंगे, जिससे नियमों का उल्लंघन होने पर भारी जुर्माना लग सकता है। अब अस्पतालों को अपने बिलिंग सॉफ्टवेयर और स्टाफ को इस नए ऑडिट सिस्टम के अनुकूल ढालना होगा, जो आने वाले समय में एक बड़ी ऑपरेशनल चुनौती साबित हो सकती है।
