कर्नाटक सरकार के उस आदेश पर फिलहाल रोक लग गई है जिसमें निजी अस्पतालों को दवाओं की खरीद लागत (procurement cost) का खुलासा करना अनिवार्य था। हाई कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 12 नवंबर तय की है, जिससे अस्पताल संचालकों को बड़ी राहत मिली है।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस सर्कुलर पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है, जिसके तहत निजी अस्पतालों को दवाओं और मेडिकल उपकरणों की खरीद लागत सार्वजनिक करनी थी। सरकार ने कोर्ट को सूचित किया कि वे 1 नवंबर से लागू होने वाले इस आदेश के कार्यान्वयन को अभी रोक रहे हैं। यह कदम उन निजी हेल्थकेयर प्रदाताओं के लिए एक अस्थायी राहत है, जिन्होंने इस आदेश के खिलाफ कानूनी लड़ाई छेड़ी थी।
क्यों विरोध कर रहे थे अस्पताल?
इस विवाद की जड़ में 'कमर्शियल डेटा' की गोपनीयता है। अस्पताल अक्सर दवा निर्माताओं और सप्लायर्स के साथ सीधे थोक सौदे (bulk purchase) करते हैं, जो गोपनीय समझौतों (confidentiality clauses) के तहत होते हैं। निजी ऑपरेटरों का कहना है कि अगर वे खरीद की कीमत सार्वजनिक करते हैं, तो इससे उनकी सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित हो सकती है और डिस्ट्रीब्यूटर्स के साथ उनके पुराने व्यापारिक संबंध खराब हो सकते हैं।
कानूनी पेंच और निवेशकों के लिए संकेत
अस्पतालों ने यह भी दलील दी है कि सरकार के पास इस तरह के विस्तृत मूल्य खुलासे की मांग करने का कोई स्पष्ट कानूनी अधिकार (statutory authority) नहीं है। यह मामला भारतीय हेल्थकेयर सेक्टर में नियामक अधिकार क्षेत्र (regulatory jurisdiction) को लेकर चल रही बहस को दर्शाता है।
निवेशकों के नजरिए से देखें तो यह खबर काफी अहम है। निजी अस्पताल अक्सर अपनी फार्मेसी सेल्स और डायग्नोस्टिक सेवाओं के मार्जिन पर काफी निर्भर रहते हैं। यदि भविष्य में सरकार ऐसे किसी आदेश को लागू करने में सफल होती है, तो अस्पतालों के मार्जिन पर दबाव बढ़ना तय है। अब सभी की निगाहें 12 नवंबर की सुनवाई पर टिकी हैं, जो यह स्पष्ट करेगा कि निजी संस्थानों पर सरकार का यह नियामक नियंत्रण कानूनी रूप से कितना मजबूत है।
