यह रणनीतिक बदलाव इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि भारत में डायबिटीज, कैंसर और ऑटोइम्यून जैसी गंभीर बीमारियों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, जिनके इलाज में बायोलॉजिक थेरेपीज़ (Biologic Therapies) बेहद महत्वपूर्ण हैं। इस नई पहल का मकसद न केवल घरेलू स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करना है, बल्कि एडवांस्ड ट्रीटमेंट्स के तेजी से बढ़ते वैश्विक बाज़ार पर भी कब्ज़ा करना है। माना जा रहा है कि 2035 तक यह बाज़ार $2.4 ट्रिलियन का आंकड़ा पार कर जाएगा। हालांकि, जेनेरिक दवाओं में 'दुनिया की फार्मेसी' के तौर पर पहचान बना चुके भारत के लिए बायोलॉजिक्स के क्षेत्र में लीडर बनना एक मुश्किल सफर होगा, जिसके लिए हर कदम बहुत सोच-समझकर उठाना होगा।
हाई-वैल्यू बायोलॉजिक्स पर नया फोकस
'बायोफार्मा शक्ति हब' दरअसल, भारत के फार्मा उद्योग के लिए एक बड़े 'इवोल्यूशन' (evolution) का संकेत है। किफायती जेनेरिक दवाओं के लिए मशहूर भारत अब ज़्यादा मुनाफे वाले और टेक्निकली एडवांस्ड बायोलॉजिक्स (Biologics) और बायोसिमिलर्स (Biosimilars) के मार्केट की ओर बढ़ रहा है। ये कॉम्प्लेक्स थेरेपीज़, जो जीवित कोशिकाओं से बनती हैं, ब्लॉकबस्टर दवाओं के पेटेंट खत्म होने और क्रॉनिक बीमारियों के इलाज की बढ़ती मांग के चलते ग्लोबल लेवल पर जबरदस्त ग्रोथ के लिए तैयार हैं। अगले पांच सालों में ₹10,000 करोड़ के इस आवंटन का उद्देश्य भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को इतना मजबूत करना है कि देश हाई-वॉल्यूम जेनेरिक प्रोड्यूसर से हाई-वैल्यू एडवांस्ड थेरेपीज़ प्रोवाइडर के तौर पर उभरे। साल 2017 में शुरू हुए नेशनल बायोप फार्मा मिशन (National Biopharma Mission) ने भले ही इनोवेशन की राह दिखाई हो, लेकिन शक्ति हब सीधे तौर पर बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन और बाज़ार में उतरने पर ज़ोर देता है।
बायोफार्मा इकोसिस्टम को मिलेगी नई जान
इस इनिशिएटिव की पूरी रणनीति बायोफार्मा सेक्टर की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत बनाने पर केंद्रित है। इसके तहत, स्पेशलाइज्ड टैलेंट की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए तीन नए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (NIPERs) खोले जाएंगे और सात मौजूदा NIPERs को बेहतर बनाया जाएगा। इतना ही नहीं, क्लिनिकल ट्रायल (Clinical Trial) के समय को कम करने और लागत घटाने के लिए 1,000 से ज़्यादा सर्टिफाइड क्लिनिकल ट्रायल साइट्स तैयार की जाएंगी। साथ ही, सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) को ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के अनुसार और बेहतर बनाने के लिए उसकी रेगुलेटरी कैपेसिटीज़ और एक डेडिकेटेड साइंटिफिक रिव्यू टीम को मजबूत किया जाएगा। इस पूरी कवायद की देखरेख डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्युटिकल्स के सेक्रेटरी मनोज जोशी की अगुआई वाली एक इंटर-मिनिस्टेरियल कमेटी कर रही है।
वैश्विक मंच पर बड़ी चुनौती
ग्लोबल बायोफार्मा मार्केट का 5% हिस्सा हासिल करने का भारत का लक्ष्य उसे सीधे तौर पर यूनाइटेड स्टेट्स (United States) और यूरोपियन यूनियन (European Union) जैसे दिग्गजों से मुकाबला करने पर मजबूर करता है, जो बायोसिमिलर बाज़ार पर पहले से काबिज हैं और जिनके पास मजबूत रिसर्च और डेवलपमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर है। चीन की आक्रामक नीतियां, जिसमें रेगुलेटरी सुधार और पूंजी तक आसान पहुंच शामिल है, एक बड़ी चुनौती पेश करती हैं। भारत का ओवरऑल फार्मा मार्केट तो मजबूत है, लेकिन बायोफार्मा सेक्टर अभी भी शुरुआती दौर में है। 'बायोफार्मा शक्ति हब' की कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि यह घरेलू इनोवेशन को कितना बढ़ावा दे पाता है और साथ ही, ग्लोबल पार्टनरशिप और इन्वेस्टमेंट को कितनी अच्छी तरह आकर्षित कर पाता है - यह वो बैलेंस है जिसे कई उभरते हुए देश बनाने में संघर्ष करते हैं।
शक्ति हब की राह में कांटे: मुख्य चुनौतियाँ
उत्पादन बढ़ाना और फंड जुटाना
बायोटेक स्टार्टअप्स के लिए शुरुआती दौर की फंडिंग तो ठीक-ठाक मिल रही है, लेकिन भारत के सामने प्रोडक्शन को बड़े पैमाने पर बढ़ाने में दिक्कतें आ रही हैं। लैबोरेटरी रिसर्च से कमर्शियल प्रोडक्शन तक पहुंचने के लिए जिस लेटर-स्टेज फंडिंग (Series B और C राउंड) की ज़रूरत होती है, उसकी कमी है। मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर भी बिखरा हुआ है, अक्सर स्टार्टअप्स को प्रोडक्ट डेवलपमेंट के अलग-अलग चरणों के लिए शहरों के बीच भागना पड़ता है, जिससे समय और पैसा दोनों बर्बाद होता है। इन इंफ्रास्ट्रक्चरल बाधाओं और कैपिटल तक पहुंच की समस्याओं को दूर करना, चीन जैसे देशों से मुकाबला करने के लिए भारत के बायोफार्मा आउटपुट को बढ़ाने के लिहाज़ से बहुत ज़रूरी है।
क्वालिटी और रेगुलेटरी अड़चनें
एक भरोसेमंद ग्लोबल फार्मा सप्लायर के तौर पर भारत की इमेज को क्वालिटी से जुड़े मुद्दों और डेटा की सटीकता की कमी ने प्रभावित किया है, जिस पर US FDA जैसे अंतर्राष्ट्रीय रेगुलेटर्स ने चिंता जताई है। भले ही CDSCO अपनी क्षमताएं बढ़ा रहा है, लेकिन बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स के लिए रेगुलेटरी अप्रूवल का रास्ता अभी भी लंबा और जटिल हो सकता है, जो मार्केट में एंट्री में देरी कर सकता है। Piramal Pharma जैसी कंपनियों ने हाल ही में 'बायोटेक प्रोजेक्ट्स में फंडिंग की अस्थिर रिकवरी' और 'इन्वेंटरी नॉर्मलाइजेशन' जैसी बातें बताई हैं, जो दिखाता है कि ऑपरेशनल एग्जीक्यूशन और फंडिंग का माहौल बड़ी कंपनियों के लिए भी जोखिम भरा हो सकता है।
टैलेंट और लीडरशिप का अभाव
भारतीय फार्मा सेक्टर में मजबूत, इंटरनेशनल लेवल की लीडरशिप की कमी एक चिंता का विषय बनी हुई है। इंडस्ट्री के कुछ जानकारों का मानना है कि टीमों को प्रेरित करने और इनोवेशन को आगे बढ़ाने के लिए ज़रूरी लीडरशिप स्किल्स का अभाव है। इसके अलावा, बायोइनफॉरमेटिक्स (Bioinformatics), जेनेटिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) और GMP-कंप्लाइंट बायोलॉजिक्स मैन्युफैक्चरिंग (GMP-compliant Biologics Manufacturing) जैसे स्पेशलाइज्ड फील्ड्स में कुशल टैलेंट की भारी कमी है, जो शक्ति हब के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को पूरा करने में बाधा डाल सकती है। बेहतरीन टैलेंट को, खासकर जिन्हें इंटरनेशनल अनुभव है, उन्हें आकर्षित करना और बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।
भारत के बायोलॉजिक्स पुश का भविष्य
'बायोफार्मा शक्ति हब' स्कीम भारत सरकार की एक अहम और समय पर की गई पहल है, जो हाई-वैल्यू बायोफार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरिंग और इनोवेशन के क्षेत्र में एक लीडिंग हब बनने की देश की मंशा को साफ दर्शाती है। इसकी सफलता का पैमाना सिर्फ फंड का आवंटन नहीं, बल्कि इसका प्रभावी कार्यान्वयन और स्केलिंग, रेगुलेटरी एफिशिएंसी और ग्लोबल प्रतिस्पर्धा जैसी गहरी चुनौतियों पर काबू पाने की क्षमता होगी। बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स की बढ़ती ग्लोबल डिमांड के साथ इस स्कीम का तालमेल, साथ ही सरकारी फोकस, ग्रोथ की अच्छी संभावनाओं को दर्शाता है। हालांकि, भारत को वैश्विक बायोफार्मास्युटिकल परिदृश्य में अपनी पूरी क्षमता हासिल करने के लिए लगातार निवेश, बेहतर रेगुलेशन और मजबूत लीडरशिप व भरोसेमंद मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं के निर्माण पर केंद्रित प्रयास करने होंगे।
