भारत में एंग्जायटी डिसऑर्डर (Anxiety Disorders) के मामलों में **1990** के बाद से **123%** से ज्यादा का उछाल आया है। यह बढ़ती समस्या अब फार्मास्युटिकल कंपनियों, डायग्नोस्टिक सर्विस और डिजिटल मेंटल हेल्थ प्लेटफॉर्म्स के लिए एक नए मार्केट अवसर के रूप में उभर रही है।
हेल्थकेयर सेक्टर में बदलता ट्रेंड
Global Burden of Disease Study के आंकड़े बताते हैं कि बीते तीन दशकों में प्रति 1,00,000 लोगों पर एंग्जायटी के मामले 2,591 से बढ़कर 5,792 हो गए हैं। इस बदलाव ने मेडिकल इंडस्ट्री की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। अब देश की प्रमुख फार्मास्युटिकल कंपनियां न्यूरोलॉजी और सेंट्रल नर्वस सिस्टम (CNS) दवाओं पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं। इसके अलावा, मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल भी अब अपनी ओपीडी सेवाओं में साइकियाट्रिक विंग को तेजी से शामिल कर रहे हैं।
इंश्योरेंस और कॉर्पोरेट वेलनेस का असर
IRDAI के उस नए मैंडेट के बाद से स्थिति में सुधार आया है, जिसमें मानसिक बीमारियों को हेल्थ इंश्योरेंस के दायरे में लाना अनिवार्य कर दिया गया है। हालांकि, आज भी सिर्फ 28% मरीजों को ही औपचारिक इलाज मिल पा रहा है। यह बड़ा 'ट्रीटमेंट गैप' हेल्थ-टेक स्टार्टअप्स के लिए टेली-कंसल्टेशन और कम्युनिटी सपोर्ट मॉडल के जरिए आगे बढ़ने का बड़ा मौका है।
क्या है बड़ी चुनौतियां?
बाजार में मांग तो है, लेकिन एक्सपर्ट्स की कमी एक बड़ी बाधा बनी हुई है। ट्रेंड्स को देखें तो भविष्य में वही कंपनियां लंबी दौड़ जीतेगी जो शहरी क्लिनिक्स के बजाय स्केलेबल और कम लागत वाले कम्युनिटी-बेस्ड केयर मॉडल तैयार करेंगी। निवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर इस बढ़ते मरीजों के बोझ को कितनी कुशलता से संभाल पाता है।
