रिफर्बिश्ड मेडिकल डिवाइस: इंडिया में पेशेंट सेफ्टी और ट्रेड के बीच छिड़ी जंग

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AuthorAditya Rao|Published at:
रिफर्बिश्ड मेडिकल डिवाइस: इंडिया में पेशेंट सेफ्टी और ट्रेड के बीच छिड़ी जंग
Overview

भारत का हेल्थ सेक्टर रिफर्बिश्ड मेडिकल उपकरणों के इंपोर्ट को लेकर एक बड़े पॉलिसी Debate की चपेट में है। डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स पेशेंट सेफ्टी और अनफेयर कॉम्पिटिशन का हवाला दे रहे हैं, जबकि मल्टीनेशनल कंपनियां ग्लोबल स्टैंडर्ड्स और एक्सेस की वकालत कर रही हैं।

पॉलिसी कमेटी ने बढ़ाई गरमा-गरमी

हेल्थ मिनिस्ट्री द्वारा गठित एक पॉलिसी रिव्यू कमेटी ने देश के तेजी से बढ़ते मेडटेक सेक्टर के लिए एक अहम पड़ाव ला खड़ा किया है। यह इनिशिएटिव पेशेंट सेफ्टी सुनिश्चित करने, 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत डोमेस्टिक इनोवेशन को बढ़ावा देने और पुराने उपकरणों के लिए मार्केट एक्सेस खोलने वाले इंटरनेशनल ट्रेड एग्रीमेंट्स के बीच नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

रेगुलेटरी टकराव की राह

इस Debate का मुख्य कारण दो रेगुलेटरी बॉडीज़ के बीच सीधा टकराव है। सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO), भारत का प्रमुख हेल्थ रेगुलेटर, मेडिकल डिवाइस रूल्स, 2017 के तहत रिफर्बिश्ड मेडिकल डिवाइस के इंपोर्ट के खिलाफ सख्त रुख अपनाए हुए है। वहीं, मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरनमेंट, फॉरेस्ट एंड क्लाइमेट चेंज (MoEFCC) ने ऐसे इंपोर्ट्स को मंजूरी दी है, जिन्हें आंशिक रूप से वेस्ट मैनेजमेंट या रीयूज़ के मामले के तौर पर देखा जा रहा है। इस रेगुलेटरी डिसोनेंस ने एक बड़ा पॉलिसी वैक्यूम बना दिया है, जिससे डोमेस्टिक प्लेयर्स चिंतित हैं। उन्हें पेशेंट सेफ्टी से समझौता होने और पुरानी टेक्नोलॉजी के 'डंपिंग ग्राउंड' बनने का डर सता रहा है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) भी ऐसे आइटम्स के लिए एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) लाइसेंस मैंडेट करता है।

मार्केट डायनामिक्स और 'मेक इन इंडिया' की उम्मीदें

भारत का मेडिकल डिवाइस मार्केट, जिसकी वैल्यू लगभग $12-18 बिलियन है और जो 2030 तक $50 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत पहलों के लिए एक प्रमुख फोकस एरिया है। पॉली मेडिक्योर (Poly Medicure) और हेमंत सर्जिकल इंडस्ट्रीज़ (Hemant Surgical Industries) जैसी डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां इंडिजिनस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में भारी निवेश कर रही हैं। वे कंज्यूमेबल्स से लेकर कॉम्प्लेक्स इमेजिंग और सर्जिकल इक्विपमेंट तक की एक विस्तृत रेंज तैयार कर रही हैं। रिफर्बिश्ड इंपोर्ट्स, जो अक्सर कम दाम पर और छोटी लाइफस्पैन के साथ आते हैं, इन डोमेस्टिक इन्वेस्टमेंट्स को अंडरकट कर सकते हैं और लोकल इनोवेशन व मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी के ग्रोथ को धीमा कर सकते हैं। देश का लक्ष्य अपनी 70-80% इंपोर्ट डिपेंडेंसी को काफी कम करना है, जो पुराने इक्विपमेंट पर रिलैक्स्ड पॉलिसी से खतरे में है।

जांच के बीच ट्रेड फैसिलिटेशन

भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच चल रही ट्रेड नेगोशिएशन्स इस पॉलिसी पर चर्चा की अर्जेंसी को और बढ़ा रही हैं। एक इंटरिम एग्रीमेंट फ्रेमवर्क में यूएस मेडिकल डिवाइस के लिए लंबे समय से चली आ रही बाधाओं को दूर करना और टेस्टिंग व मार्केट एक्सेस के लिए यूएस या इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स को स्वीकार करना शामिल हो सकता है। जहां कुछ लोग इसे मार्केट एक्सपेंशन के लिए स्वागत योग्य मान रहे हैं, वहीं AiMeD जैसे इंडस्ट्री बॉडीज़ रेगुलेटरी प्रोसेसेज में मौजूदा एसिमेट्रीज़ को लेकर चिंतित हैं। वे रेसिप्रोकल फेयरनेस की मांग कर रहे हैं और ऐसे ट्रेड डील्स के खिलाफ चेतावनी दे रहे हैं जो डोमेस्टिक इनोवेशन को डिसएडवांटेज कर सकते हैं। यूएस भारत का सबसे बड़ा मेडिकल डिवाइस इंपोर्ट सोर्स बना हुआ है, जो इन ट्रेड डायनामिक्स के महत्वपूर्ण प्रभाव को दर्शाता है।

पेशेंट सेफ्टी पर बड़ा सवाल

रिफर्बिश्ड मेडिकल इक्विपमेंट इंपोर्ट करने से जुड़ा सबसे बड़ा रिस्क पेशेंट सेफ्टी है। पुरानी टेक्नोलॉजी, इनकंसिस्टेंट परफॉरमेंस, लिमिटेड ट्रेसेबिलिटी, छोटी लाइफस्पैन और इनएडिक्वेट कैलिब्रेशन जैसी चिंताओं के कारण डायग्नोस्टिक एक्यूरेसी कम हो सकती है और क्लीनिकल आउटकम्स प्रभावित हो सकते हैं। CDSCO और MoEFCC के बीच रेगुलेटरी टकराव एक ऐसा लूपहोल बनाता है, जहां संभावित रूप से असुरक्षित उपकरण मार्केट में एंट्री कर सकते हैं, जिससे भारत की रेगुलेटरी क्रेडिबिलिटी कमजोर हो सकती है। इसके अलावा, विकसित देशों से एंड-ऑफ-लाइफ इक्विपमेंट के लिए भारत को 'डंपिंग ग्राउंड' बनाने की धारणा एक रेपुटेशनल रिस्क पैदा करती है और 'मेक इन इंडिया' विजन के सीधे विपरीत जाती है, जिसका लक्ष्य सेल्फ-रिलायंस और हाई-क्वालिटी डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है। पेशेंट सेफ्टी एंड एक्सेस इनिशिएटिव ऑफ इंडिया फाउंडेशन द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट में शुरू की गई जुडिशियल रिव्यू भी इन चिंताओं की गंभीरता को उजागर करती है।

भविष्य की राह

सरकार द्वारा पॉलिसी कमेटी का गठन रिफर्बिश्ड मेडिकल डिवाइस के अराउंड रेगुलेशंस को फॉर्मलाइज करने के इरादे का संकेत देता है। इस कमेटी का नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या वे ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के बेंचमार्क पर एक मजबूत, एनफोर्सिबल फ्रेमवर्क स्थापित कर पाते हैं। यह कॉस्ट-इफेक्टिव हेल्थकेयर सॉल्यूशंस की मांग को स्ट्रिंजेंट पेशेंट सेफ्टी प्रोटोकॉल्स और डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करने की स्ट्रैटेजिक इम्परेटिव के साथ संतुलित करने में सफल होते हैं या नहीं। 'मेक इन इंडिया' इनिशिएटिव की सफलता और भारत की मेडटेक हब बनने की महत्वाकांक्षा इस कॉम्प्लेक्स रेगुलेटरी चैलेंज के समाधान से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई है।

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