जेनेरिक बनाम इनोवेशन: वैल्यूएशन का खेल
यह फैसला सिर्फ भारतीय जेनेरिक निर्माताओं और मरीजों के लिए एक जीत नहीं है, बल्कि यह भारतीय फार्मा इंडस्ट्री के एक महत्वपूर्ण मोड़ का प्रतीक है। जहां भारत ने किफायती दवाओं के लिए 'दुनिया की फार्मेसी' के तौर पर अपनी पहचान बनाई है, वहीं ग्लोबल बायोटेक इनोवेशन की बढ़ती रफ़्तार को देखते हुए भविष्य की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति का गंभीर मूल्यांकन करना ज़रूरी हो गया है।
ग्लोबल बायोफार्मास्युटिकल दिग्गज AbbVie Inc. का Venetoclax पेटेंट आवेदन जनवरी के अंत में भारतीय पेटेंट ऑफिस ने खारिज कर दिया। इस फैसले से भारतीय जेनेरिक निर्माताओं को तुरंत बाजार में एंट्री मिल गई है, जिससे AbbVie की कमाई पर असर पड़ सकता है, जो अपनी ग्रोथ के लिए ऐसी ब्लॉकबस्टर दवाओं पर निर्भर करती है। $280 अरब के मार्केट कैप और लगभग 15x के प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेश्यो वाली AbbVie, इनोवेशन पर टिकी एक ऐसी कंपनी है। वहीं, भारत की बड़ी कंपनियां जैसे Sun Pharmaceutical Industries (~25 अरब डॉलर मार्केट कैप, ~22x P/E), Dr. Reddy's Laboratories (~15 अरब डॉलर मार्केट कैप, ~25x P/E) और Cipla Ltd. (~12 अरब डॉलर मार्केट कैप, ~30x P/E) ऐतिहासिक रूप से जेनेरिक और कॉम्प्लेक्स जेनेरिक के उत्पादन में अपनी कुशलता के लिए जानी जाती हैं। Venetoclax का परिणाम भारतीय कंपनियों के लिए इस स्थापित मॉडल के तत्काल वित्तीय लाभ को रेखांकित करता है।
रणनीतिक शतरंज का खेल: भारत, चीन और अमेरिका
यह घटनाक्रम ग्लोबल फार्मा R&D में बड़े बदलावों के बीच हुआ है। अमेरिका नई दवा अप्रूवल में लगातार आगे है, लेकिन चीन एक मज़बूत प्रतियोगी के रूप में उभरा है, जो अब वैश्विक विकास के करीब 20% दवाओं का हिस्सा है। चीन को सरकारी समर्थन और इनोवेशन को बढ़ावा देने वाले नियामक सुधारों से बल मिला है। पिछले दशक में फार्मा सेक्टर में चीन के R&D निवेश की वृद्धि दर ज़बरदस्त रही है। वहीं, भारतीय फार्मा कंपनियों पर 'फर्स्ट-इन-क्लास' थेरेपी विकसित करने के लिए अपने निवेश को बढ़ाने का दबाव है, ताकि वे वैश्विक स्तर पर उच्च-मूल्य वाली दवा विकास में प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा कर सकें।
जेनेरिक के जाल में फंसने का जोखिम
भारत के फार्मा सेक्टर के लिए सबसे बड़ा जोखिम यह है कि वह सिर्फ जेनेरिक दवाओं का पावरहाउस बनकर रह जाए और इनोवेशन की ओर पर्याप्त रूप से न बढ़ पाए। यह रणनीति, जो बाजार पहुंच और सामर्थ्य सुनिश्चित करती है, भारत को नई दवाएं बनाने वाले के बजाय कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग या पेटेंट चुनौती देने वाले की भूमिका तक सीमित कर सकती है। इस रास्ते पर लंबी अवधि के रिटर्न इनोवेशन-आधारित ग्रोथ की तुलना में कम हैं। साथ ही, मौजूदा पेटेंट को चुनौती देना, जैसे Venetoclax के मामले में सफल रहा, एक प्रतिक्रियावादी रणनीति है। 'फर्स्ट-इन-क्लास' दवाएं विकसित करने के लिए भारी, दीर्घकालिक R&D निवेश की आवश्यकता होती है, जिसमें विफलता की उच्च दर और लंबा नियामक रास्ता शामिल है। अमेरिकी और चीनी कंपनियों की तुलना में, जो R&D में भारी निवेश कर रही हैं, भारतीय कंपनियों को अपनी खुद की डिस्कवरी इंजन को मजबूत करने की आवश्यकता है, अन्यथा वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट सकती हैं।
भविष्य की राह: इनोवेशन की ज़रूरत
विश्लेषकों का मानना है कि भारत की जेनेरिक निर्माण क्षमता मज़बूत है और यह वैश्विक दवा पहुंच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हालांकि, 'फर्स्ट-इन-क्लास' दवा खोज की गति और पैमाने को लेकर सतर्कता बरती जा रही है। भारतीय फार्मा सेक्टर के भविष्य का विकास रणनीतिक R&D निवेश, एक ऐसे इकोसिस्टम को बढ़ावा देने पर निर्भर करेगा जो नई दवा विकास का समर्थन करता हो, और पाइपलाइन को तेज़ करने के लिए पार्टनरशिप या अधिग्रहण पर विचार करने पर निर्भर करेगा। नई रासायनिक संस्थाओं (NCEs) और बायोेलॉजिक्स के लिए घरेलू R&D को प्रोत्साहित करने वाली सरकारी पहलों की भी भारत की लंबी अवधि की दिशा को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका होगी।