सरकार ने 'प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव' (PLI) स्कीम के ज़रिए देश में दवाइयों के कच्चे माल का उत्पादन बढ़ाने की बड़ी कोशिशें कीं। इस स्कीम ने कई कंपनियों को निवेश करने और क्षमता बढ़ाने के लिए प्रेरित भी किया है। लेकिन, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। 6-APA जैसे ज़रूरी पेनिसिलिन प्रीकर्सर (penicillin precursor) के इम्पोर्ट में चीन की हिस्सेदारी 96% तक पहुंच गई है, वहीं पेनिसिलिन सॉल्ट्स (penicillin salts) के मामले में यह आंकड़ा 93% है। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत की ‘Pharmacy of the World’ वाली पहचान कितनी मज़बूत इम्पोर्ट पर टिकी है।
यह निर्भरता कोई नई नहीं है। चीन ग्लोबल API मार्केट में एक बड़ा खिलाड़ी है, जो दुनिया का करीब 20% API बनाता है और 180 से ज़्यादा देशों को सप्लाई करता है। इसकी वजह है चीन की विशाल प्रोडक्शन कैपेसिटी और लागत में बड़ा फायदा। कहा जाता है कि चीन में API का उत्पादन भारत के नए डोमेस्टिक सेक्टर के मुकाबले 35-40% सस्ता पड़ता है। यही कारण है कि भारत, जो खुद कई दवाइयां बनाता है, अपने API इम्पोर्ट का 70-80% हिस्सा चीन से ही लेता है, खासकर कुछ एंटीबायोटिक्स के लिए यह निर्भरता और भी ज़्यादा है।
PLI स्कीम के तहत अब तक ₹4,814.1 करोड़ का निवेश हुआ है और 38 प्रोजेक्ट्स शुरू हो चुके हैं, जिससे डोमेस्टिक कैपेसिटी बढ़ी है। इस स्कीम से अब तक ₹2.72 लाख करोड़ की बिक्री हुई है और अनुमान है कि ₹2,192.04 करोड़ के इम्पोर्ट की बचत हुई है। मगर, यह सब तब है जब कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भरता अभी भी 70% से ऊपर बनी हुई है। सितंबर 2025 तक, PLI बजट का केवल 12% ही डिसबर्स (disburse) हुआ है, जो धीमी प्रगति का संकेत है। एनवायर्नमेंटल अप्रूवल (environmental approvals) और सब्सिडी पेमेंट में देरी जैसी दिक्कतें भी इस राह में रोड़ा बन रही हैं।
यह चीन पर बढ़ती निर्भरता भारत के लिए एक बड़ा स्ट्रेटेजिक रिस्क (strategic risk) है, खासकर भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) जैसे भारत-चीन सीमा विवाद के चलते। चीन अपनी API सप्लाई को राजनीतिक दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है, जिससे देश में दवाओं की किल्लत हो सकती है। एनालिस्ट्स का मानना है कि PLI स्कीम का पूरा असर दिखने में कई साल लगेंगे। फार्मा कंपनियां अब API के लिए और ज़्यादा इंसेंटिव (incentives) की मांग कर रही हैं ताकि सेल्फ-रिलायंस (self-reliance) बढ़ाई जा सके। मार्च 2025 तक ₹1,362 करोड़ की इम्पोर्ट बचत का अनुमान है, लेकिन जब तक हम ज़रूरी रॉ मैटेरियल (raw material) के लिए चीन पर निर्भर रहेंगे, भविष्य में सप्लाई चेन की मुश्किलें बनी रहेंगी। भारत का फार्मा मार्केट कैप करीब ₹18.02 लाख करोड़ का है, जिसे सुरक्षित रखना ज़रूरी है।