Sun Pharma, Novo Nordisk: ब्रांड को लेकर फार्मा दिग्गजों में घमासान! क्या दवाओं के नाम पर हो रही है धोखाधड़ी?

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Sun Pharma, Novo Nordisk: ब्रांड को लेकर फार्मा दिग्गजों में घमासान! क्या दवाओं के नाम पर हो रही है धोखाधड़ी?
Overview

भारत के फार्मा सेक्टर में दवाओं के ब्रांड नामों को लेकर कानूनी लड़ाई तेज हो गई है। Sun Pharma, Novo Nordisk और Dr. Reddy's Laboratories जैसी दिग्गज कंपनियां अपने ब्रांड की पहचान बचाने के लिए हाई-स्टेक्स लीगल फाइट्स (legal fights) में उलझी हुई हैं। पेटेंट एक्सपायरी (patent expiry) के बाद जेनेरिक दवाओं (generic drugs) के बाजार में उतरने से ये डिस्प्यूट्स (disputes) और गंभीर हो गए हैं, जो सीधे तौर पर मरीजों की सुरक्षा, मार्केट शेयर और कंपनी के फाइनेंशियल नतीजों (financial results) को प्रभावित कर रहे हैं।

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फार्मा कंपनियों में ब्रांड के लिए 'जंग'

फार्मा जगत में ब्रांड नामों पर कोर्ट-कचहरी का सिलसिला तेजी से बढ़ा है। यह फार्मा कंपनियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और आक्रामक ब्रांड प्रोटेक्शन (brand protection) की रणनीति को दर्शाता है। Bombay High Court ने हाल ही में Sun Pharma के 'Pantocid' से मिलते-जुलते नाम 'PANTOZED-40' की मार्केटिंग पर रोक लगा दी, क्योंकि इससे ग्राहकों में कन्फ्यूजन (confusion) पैदा होने का खतरा था।

एक और बड़े मामले में, Dr. Reddy's Laboratories को अपनी सेमाग्लूटाइड जेनेरिक दवा 'Olymviq' बेचने से मना किया गया, क्योंकि यह Novo Nordisk की ब्लॉकबस्टर दवा 'Ozempic' से बहुत मिलती-जुलती थी। Dr. Reddy's को 30 दिनों के अंदर 'Olymra' जैसे नए नाम पर स्विच करना होगा। इसी तरह, Intas Pharmaceuticals को भी Sun Pharma के 'Bevetex' से मिलती-जुलती अपनी ऑन्कोलॉजी (oncology) ब्रांड 'Bevtas' पर पाबंदियों का सामना करना पड़ा।

यह जंग इसलिए और तेज हो रही है क्योंकि सेमाग्लूटाइड जैसे प्रमुख दवाओं के पेटेंट एक्सपायर हो रहे हैं, जिससे सस्ती जेनेरिक दवाओं की बाढ़ आ गई है और स्थापित ब्रांडों को अपनी मार्केट पोजीशन डिफेंड (defend) करनी पड़ रही है।

दवा के नाम क्यों हैं इतने अहम: सेफ्टी और भरोसा

दवा कंपनियों के लिए ब्रांड नाम सिर्फ मार्केटिंग का जरिया नहीं हैं, बल्कि ये पेशेंट सेफ्टी (patient safety) और कंपनी की मार्केट सक्सेस (market success) के लिए भी बेहद जरूरी हैं। एक्सपर्ट्स (experts) का कहना है कि एक जैसे सुनाई देने वाले दवा नामों से मेडिकेशन एरर्स (medication errors) का गंभीर खतरा है, खासकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में। यह एक बड़ी चिंता का विषय है, खासकर जब प्रिस्क्रिप्शंस (prescriptions) हाथ से लिखे जाते हैं या बोलकर दिए जाते हैं।

भारतीय अदालतों ने भी माना है कि पब्लिक हेल्थ (public health) की सुरक्षा के लिए कन्फ्यूजिंग (confusing) ड्रग ट्रेडमार्क्स (trademarks) के खिलाफ सख्त कदम उठाने की जरूरत है। एक भरोसेमंद ब्रांड मरीजों और डॉक्टरों के बीच विश्वास पैदा करता है, जो प्रिस्क्राइबिंग चॉइसेज (prescribing choices) को प्रभावित करता है और पेटेंट खत्म होने के बाद भी लॉयल्टी (loyalty) बनाए रखता है। यह मजबूत ब्रांड रेपुटेशन (reputation) एक कीमती एसेट (asset) है, जो ऊंची कीमतों को सपोर्ट करता है और बिजी मेडिकल फील्ड्स (medical fields) में कंपनियों को एज (edge) देता है।

पेटेंट एक्सपायरी और रेगुलेटरी गैप का खेल

कई बड़ी दवाओं के पेटेंट एक्सपायर हो रहे हैं, जिसे 'पेटेंट क्लिफ' (patent cliff) का दौर कहा जाता है। यह सस्ती जेनेरिक वर्जन (generic versions) के लिए रास्ता खोलता है, जिससे दवाएं ज्यादा सुलभ होती हैं, लेकिन मूल निर्माताओं के बीच मार्केट शेयर (market share) बचाने की जंग छिड़ जाती है।

भारत में दवाओं के नामकरण के नियमों को कमजोर निगरानी और कम्प्लीट डेटाबेस (complete database) की कमी के कारण आलोचना का सामना करना पड़ा है, जिससे कन्फ्यूजिंगली सिमिलर (confusingly similar) नामों का मुद्दा और बिगड़ गया है। हालांकि अब नियमों के तहत कंपनियों को यह वादा करना होता है कि उनके नाम कन्फ्यूजन पैदा नहीं करेंगे, लेकिन यह सेल्फ-सर्टिफाइड (self-certified) होता है और इसमें सेंट्रल रजिस्ट्री (central registry) का अभाव है। इस रेगुलेटरी गैप (regulatory gap) की वजह से सिमिलर ब्रांड नामों का आसानी से गलत प्रिस्क्राइबिंग और डिस्पेंसिंग (dispensing) में इस्तेमाल हो सकता है, जिससे पब्लिक हेल्थ को बड़ा खतरा पैदा होता है।

ड्रग नेम कन्फ्यूजन के खतरे

अलग-अलग ड्रग नामों के लिए यह लड़ाई गंभीर जोखिमों के साथ आती है। ट्रेडमार्क इन्फ्रिंजमेंट (trademark infringement) पर लंबी और महंगी मुकदमेबाजी कंपनियों के फाइनेंस (finances) को खत्म कर सकती है। ब्रांड डिस्प्यूट्स (brand disputes) किसी भी पक्ष की जीत के बावजूद कंपनी की रेपुटेशन और पब्लिक इमेज को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

सबसे बड़ा खतरा पेशेंट सेफ्टी का है। सिमिलर ड्रग नामों से होने वाला कन्फ्यूजन गंभीर मेडिकेशन एरर्स (medication errors) का कारण बन सकता है, जिसके परिणाम घातक हो सकते हैं। अमेरिका जैसे देशों में FDA जैसे रेगुलेटर्स (regulators) ऐसे कन्फ्यूजन से बचने के लिए ड्रग नामों की बारीकी से समीक्षा करते हैं। भारत का रेगुलेटरी सिस्टम हालांकि कम सख्त है। ब्रांड नामों को प्रोटेक्ट करना जरूरी है, लेकिन यह दवा इनोवेशन (innovation) को प्रोत्साहन देने और पब्लिक की किफायती व सुलभ जेनेरिक मेडिसिन्स (medicines) की जरूरत को संतुलित करने की चुनौती को भी उजागर करता है।

आगे क्या? ब्रांड प्रोटेक्शन का दबदबा

फार्मास्युटिकल प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ ब्रांड्स को लीगल तरीकों से प्रोटेक्ट करने का यह ट्रेंड (trend) जारी रहने की उम्मीद है। पेटेंट एक्सपायरी के बाद के दौर में, जहां जेनेरिक दवाओं की तेज एंट्री और कीमतों में गिरावट देखी जा रही है, मजबूत ब्रांड स्ट्रैटेजी (brand strategy) आवश्यक है। रेगुलेटर्स पेशेंट सेफ्टी को बेहतर बनाने और गलतियों को कम करने के लिए ड्रग नामकरण के लिए सख्त नियमों का संकेत दे रहे हैं। कंपनियों को अपने ब्रांड एसेट्स (brand assets) को सुरक्षित करने और इस चुनौतीपूर्ण माहौल में अपनी मार्केट पोजीशन (market position) बनाए रखने के लिए थोरो (thorough) ट्रेडमार्क चेक्स, ग्लोबल प्रोटेक्शन प्लान्स और लगातार निगरानी में ज्यादा निवेश करना होगा।

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