भारत सरकार और इंडस्ट्री, देश के मेडिकल टेक्नोलॉजी (Medtech) सेक्टर में आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम बढ़ा रहे हैं। इस दिशा में, देश का पहला डेडिकेटेड मेडटेक फंड, MedArtha Capital, लॉन्च किया गया है। इसका लक्ष्य ₹1,000 करोड़ का कॉर्पस जुटाना है, जो घरेलू मेडटेक कंपनियों को मजबूत बनाने और आयात पर निर्भरता को कम करने में अहम भूमिका निभाएगा।
मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस
MedArtha Capital की शुरुआत भारत की एडवांस मेडिकल डिवाइसेस, जैसे MRI मशीन, CT स्कैनर, और कैथलैब इक्विपमेंट के लिए इम्पोर्ट पर भारी निर्भरता को खत्म करने के उद्देश्य से हुई है। इंडस्ट्री के अनुभवी गणेश साबत के नेतृत्व वाला यह फंड, ₹30 करोड़ से ₹80 करोड़ तक का रेवेन्यू (Revenue) जेनरेट करने वाली हाई-ग्रोथ मेडटेक कंपनियों को सपोर्ट करेगा। इसका मुख्य फोकस इन कंपनियों को प्रोडक्शन स्केल करने और ग्लोबल लेवल पर कॉम्पिटिटिव बनने में मदद करना है, जो सीधे तौर पर 'मेक इन इंडिया' पहल को मजबूती देगा। फंड का प्लान अगले दो से तीन साल में अपना पैसा इन्वेस्ट करना है, और अपने आठ साल के लाइफसाइकिल में 10 से 12 कंपनियों को पोर्टफोलियो में शामिल करना है।
मार्केट ग्रोथ और सरकारी समर्थन
यह पहल भारतीय मेडटेक मार्केट की शानदार ग्रोथ पोटेंशियल को भी दर्शाती है। अनुमान है कि यह मार्केट 2025 तक $15.2 बिलियन तक पहुंच जाएगा और 2030 तक $50.1 बिलियन के आंकड़े को पार कर सकता है, जो 26.9% की शानदार सीएजीआर (CAGR) से बढ़ रहा है। इस ग्रोथ को नेशनल मेडिकल डिवाइसेस पॉलिसी, प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम और मेडिकल डिवाइसेस पार्क्स स्कीम जैसी सरकारी पहलों का भी साथ मिल रहा है। खास बात यह है कि इस फंड में सरकार लगभग ₹500 करोड़ का योगदान रिसर्च डेवलपमेंट एंड इनोवेशन (RDI) स्कीम के तहत दे सकती है, जो इस सेक्टर के प्रति नीतिगत समर्थन को साफ दर्शाता है। यह अमाउंट ₹1 लाख करोड़ के एक बड़े सरकारी कॉर्पस का हिस्सा होगा।
चुनौतियाँ और आगे का रास्ता
हालांकि, इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने में कुछ चुनौतियाँ भी हैं। भारत में कॉन्ट्रैक्ट डेवलपमेंट एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑर्गनाइजेशन (CDMO) का इकोसिस्टम अभी भी शुरुआती दौर में है, जिसका मतलब है कि मेडआर्था कैपिटल को इस स्पेस को डेवलप करने में मदद करनी होगी, जो कि एक हाई-रिस्क वाला काम है। इम्पोर्टेड कंपोनेंट्स पर निर्भरता लागत को बढ़ा सकती है और सप्लाई चेन में समस्याएं पैदा कर सकती है। मेडटेक सेक्टर अत्यधिक रेगुलेटेड है, और नए डिवाइसेस के अप्रूवल प्रोसेस में लंबा समय और भारी खर्च लग सकता है। इसके अलावा, विशेष प्रतिभा (Specialized Talent) की कमी भी एक चुनौती हो सकती है। गणेश साबत का पिछला अनुभव (Sahajanand Medical Technologies में) महत्वपूर्ण है, लेकिन नई कंपनियों को विकसित करने के लिए इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) प्रोटेक्शन और ग्लोबल रेगुलेटरी न्युअंसेस की गहरी समझ जरूरी होगी।
कुल मिलाकर, MedArtha Capital की लॉन्चिंग भारत के मेडटेक विनिर्माण (Manufacturing) को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। फंड की सफलता नियामक ढांचे को नेविगेट करने, इनोवेशन को बढ़ावा देने और रणनीतिक साझेदारी बनाने की क्षमता पर निर्भर करेगी। यह भारत को वैश्विक मेडटेक हब बनाने की राह पर एक अहम पड़ाव साबित हो सकता है।