हेल्थकेयर सेक्टर में भारत की बड़ी उड़ान
यह बड़ी छलांग भारत की हेल्थकेयर इंडस्ट्री के लिए एक नया मील का पत्थर साबित हो रही है। केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के मुताबिक, 2022 में करीब $6 अरब का रहा भारत का मेडिकल वैल्यू ट्रैवल मार्केट, 2026 तक $13 अरब को पार कर जाएगा। इसकी एक बड़ी वजह है भारत का एक कॉम्प्रिहेंसिव हेल्थकेयर हब के तौर पर उभरना। यहां मरीजों को किफ़ायती दाम पर बेहतरीन क्वालिटी की हेल्थकेयर सर्विसेज मिलती हैं। देश में ऐसे कई संस्थान हैं जिन्हें इंटरनेशनल एक्रिडिएशन (International Accreditation) मिला हुआ है और यहां के डॉक्टर वर्ल्ड क्लास हैं। सिर्फ पैसे बचाना ही नहीं, बल्कि मरीजों को मिलने वाला साइंटिफिक और ओवरऑल वेलनेस अप्रोच भी उन्हें भारत की ओर खींच रहा है। पश्चिमी देशों के मुकाबले यहां इलाज का खर्चा 1/5वें से 1/10वें तक कम हो सकता है। 'Heal in India' कैंपेन, मेडिकल वीजा के प्रोसेस को आसान बनाना, और इंटीग्रेटेड मेडिकल व वेलनेस हब का डेवलपमेंट, ये सब मिलकर भारत को ग्लोबल पेशेंट्स के लिए और भी आकर्षक बना रहे हैं। इस सेक्टर में 2020 से 2027 के बीच 21.1% की अनुमानित CAGR (Compound Annual Growth Rate) देखी जा रही है।
ग्लोबल मार्केट में भारत की मजबूत पकड़
भारत अब मेडिकल टूरिज्म में थाईलैंड और सिंगापुर जैसे स्थापित देशों को कड़ी टक्कर दे रहा है। जहां थाईलैंड 'बेस्ट-कॉस्ट प्रोवाइडर' स्ट्रेटेजी पर फोकस कर रहा है, वहीं सिंगापुर अपनी एडवांस्ड मेडिकल सिस्टम्स पर। लेकिन भारत, किफ़ायती दामों के साथ-साथ कार्डियोलॉजी, ऑर्थोपेडिक्स और कॉस्मेटिक सर्जरी जैसे कई स्पेशियलिटीज़ में अपनी पहचान बना रहा है। ओवरऑल ग्लोबल मेडिकल टूरिज्म मार्केट की बात करें तो यह 2022 में $115.6 अरब से बढ़कर 2030 तक $286 अरब से ज्यादा होने का अनुमान है, जिसमें 10.8% की CAGR रहेगी। भारत के लिए तो यह आंकड़ा और भी चौंकाने वाला हो सकता है, कुछ अनुमानों के मुताबिक यह 2035 तक $58.2 अरब तक पहुंच सकता है। भारत आने वाले मरीजों में बांग्लादेश, इराक, मालदीव, अफगानिस्तान, ओमान, यमन, सूडान, केन्या, नाइजीरिया और तंजानिया जैसे देशों का बड़ा योगदान है। AYUSH वीजा जैसी खास वीजा कैटेगरी और पॉलिसी रिफॉर्म्स के दम पर भारत एशिया-पैसिफिक वेलनेस टूरिज्म मार्केट में पांचवें नंबर पर है। ग्लोबल मेडिकल टूरिज्म इंडेक्स (MTI) में भी भारत 46 देशों में से 10वें स्थान पर है।
क्या हैं चुनौतियां?
लेकिन इस चमकदार तस्वीर के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। सबसे बड़ी दिक्कत है एक यूनिफाइड रेगुलेटरी फ्रेमवर्क (Unified Regulatory Framework) का न होना। इससे सेक्टर थोड़ा बिखरा हुआ है और क्वालिटी मॉनिटरिंग में एकरूपता नहीं है। हालांकि भारत में NABH एक्रिडिएशन है, लेकिन इंटरनेशनल पेशेंट्स अक्सर JCI एक्रिडिएशन को ज्यादा अहमियत देते हैं, जिससे एक अवेयरनेस गैप (Awareness Gap) पैदा होता है। सिर्फ क्लीनिकल क्वालिटी ही काफी नहीं, सिस्टम की मैच्योरिटी भी जरूरी है। कुछ जगहों पर हाइजीन (Hygiene) को लेकर सवाल उठ सकते हैं, या बड़े शहरों के बाहर हेल्थकेयर सर्विसेज का बिखरा हुआ होना एक समस्या है। इसके अलावा, डोमेस्टिक और इंटरनेशनल पेशेंट्स के लिए इंश्योरेंस कवरेज और पोर्टेबिलिटी (Portability) की कमी भी एक अड़चन है। मलेशिया और सिंगापुर जैसे देश भी कड़ी कॉम्पिटिशन दे रहे हैं। साथ ही, कुछ खास देशों, जैसे बांग्लादेश, पर ज्यादा निर्भरता भी एक रिस्क है, क्योंकि उन देशों में राजनीतिक बदलावों का सीधा असर मरीजों के आने पर पड़ सकता है। यह भी देखना होगा कि कहीं डोमेस्टिक और इंटरनेशनल पेशेंट्स के लिए अलग-अलग दर्जे की हेल्थकेयर सर्विस तो न दी जाए।
भविष्य की राह
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स और सरकारी एजेंसियां इन चुनौतियों पर काम कर रही हैं। 'Heal in India' पहल और नेशनल मेडिकल एंड वेलनेस टूरिज्म बोर्ड का गठन एक कोऑर्डिनेटेड अप्रोच (Coordinated Approach) का संकेत देता है। भविष्य में ग्रोथ इस बात पर निर्भर करेगी कि हम अपने इंटरनल सिस्टम्स को कितना मजबूत करते हैं, डेटा इंटीग्रिटी (Data Integrity) कितनी बेहतर होती है, और प्राइसिंग में कितनी पारदर्शिता आती है। अब फोकस सिर्फ मेडिकल स्किल पर नहीं, बल्कि एक मजबूत और भरोसेमंद हेल्थकेयर इकोसिस्टम बनाने पर है, ताकि भारत न सिर्फ मरीजों को आकर्षित करे, बल्कि ग्लोबल मार्केट में अपनी लीडरशिप बनाए रखे। सिर्फ क्लीनिकल एक्सीलेंस (Clinical Excellence) ही नहीं, बल्कि सिस्टमैटिक मैच्योरिटी (Systemic Maturity) भी लंबे समय की सफलता के लिए बहुत जरूरी है।