हेल्थकेयर में प्राइवेट इक्विटी का बूम
भारत का हेल्थकेयर सेक्टर इस वक्त प्राइवेट इक्विटी (PE) और वेंचर कैपिटल (VC) फंड्स के लिए सोने की खान साबित हो रहा है। 2020 से 2024 के बीच, करीब $14.5 अरब का निवेश आया है, जिसमें से 58% पैसा अकेले 2023 और 2024 में ही लगा है। पिछले 5 सालों में कुल मिलाकर $15.5 अरब का PE/VC निवेश हेल्थकेयर में हुआ है। इस बूम की वजहें साफ हैं - बढ़ती आबादी, बेहतर होती आर्थिक स्थिति, सरकार का हेल्थ पर बढ़ा खर्च और मेडिकल टूरिज्म के लिए भारत की पहचान। 2023 में जहाँ यह मार्केट $180 अरब का था, वहीं 2028 तक इसके $320 अरब तक पहुँचने का अनुमान है, जो अगले 5 सालों में 12% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) दिखा रहा है। अस्पतालों पर खास तौर पर PE फर्मों की नज़र है, जिन्होंने 2022 से 2024 के बीच $4.96 अरब का निवेश किया है। यह पिछले 5 सालों के कुल PE हेल्थकेयर निवेश का 68% है। एशिया-पैसिफिक में PE हेल्थकेयर डील वॉल्यूम का 26% अकेला भारत है।
Sahyadri Hospitals: तेज़ वैल्यूएशन का जीता-जागता उदाहरण
हेल्थकेयर एसेट्स के इस तेज़ वित्तीयकरण (financialization) का सबसे बड़ा उदाहरण Sahyadri Hospitals है। 2019 में, इसके फाउंडर-प्रमोटर्स ने यह चेन लगभग ₹1,000 करोड़ में Everstone को बेची। एक साल के अंदर ही, Everstone ने करीब 2.5 गुना मुनाफा कमाकर इसे Ontario Teachers’ Pension Plan (OTPP) को लगभग ₹2,500 करोड़ में बेच दिया। और तो और, 2025 तक, OTPP ने इसे Temasek-backed Manipal Hospitals को लगभग ₹6,400 करोड़ में बेचकर बाहर निकल गया। छह सालों में तीन बार मालिकाना हक़ बदलना और हर बार वैल्यूएशन का इतना ज़्यादा बढ़ना, यह सिर्फ ऑर्गैनिक ग्रोथ नहीं, बल्कि आक्रामक फाइनेंशियल इंजीनियरिंग का नतीजा है। यह सिर्फ एक उदाहरण नहीं है; PE फर्मों ने अक्सर 21% का मीडियन इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न (IRR) दिलाया है, जो BSE हेल्थकेयर इंडेक्स के 16% से कहीं बेहतर है। PE फर्मों का लक्ष्य आमतौर पर एग्जिट (exit) के समय अपने निवेश को तीन गुना करना होता है।
अमेरिका का अनुभव: वित्तीयकरण के खतरे
इस सब के बीच, अमेरिका का अनुभव हमें चेतावनी की घंटी बजाता है। वहाँ की स्टडीज़ लगातार दिखाती हैं कि PE-ओन्ड अस्पताल और डॉक्टर प्रैक्टिस, दूसरे अस्पतालों की तुलना में ज़्यादा कीमतें वसूलते हैं, प्रोसीजर (procedure) की संख्या बढ़ाते हैं और बिलिंग में ज़्यादा आक्रामक होते हैं। डॉक्टर्स पर 'पर-पेशेंट रेवेन्यू' (per-patient revenue) बढ़ाने का दबाव रहता है, जिससे प्रोफेशनल ऑटोनॉमी (professional autonomy) से समझौता हो सकता है। सबसे बड़ी चिंता कर्ज़-आधारित अधिग्रहण (debt-driven acquisitions) की है, जिससे अस्पतालों पर भारी लेवरेज (leverage) आ जाता है। अमेरिका में, ब्याज चुकाने को प्राथमिकता देने के चक्कर में ज़रूरी सेवाओं में कटौती हुई है, और कुछ अस्पतालों को बंद भी करना पड़ा है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। कीमतों में पारदर्शिता की कमी (price opacity) के कारण अचानक बड़े बिल आ जाते हैं, जिससे मरीज़ आर्थिक तंगी में आ जाते हैं। इसके अलावा, अमेरिकी हेल्थकेयर में PE निवेश अक्सर हाई-मार्जिन, स्पेशलाइज्ड थेरेपीज़ (oncology, neurology) पर केंद्रित होता है, जिससे पब्लिक हेल्थ के लिए ज़रूरी प्राइमरी केयर (primary care) सेवाएं पीछे छूट जाती हैं। अमेरिका, जो अपने GDP का 17% से ज़्यादा और प्रति व्यक्ति $8,500 खर्च करता है, उसके बावजूद भी स्वास्थ्य सेवाओं में जूझ रहा है।
भारत की अपनी चिंताएँ और रेगुलेशन की ज़रूरत
भारत की स्थिति इन जोखिमों को और बढ़ा देती है। यहाँ पहले से ही लोगों को हेल्थ पर ज़्यादातर अपना पैसा खर्च करना पड़ता है (out-of-pocket expenditure), इंश्योरेंस कवरेज (insurance coverage) भी कम है और मेडिकल दिवालियापन (medical bankruptcy) का खतरा बना रहता है। प्रति 1,000 लोगों पर सिर्फ 1.3 अस्पताल बेड हैं – जो OECD देशों के औसत 4.3 से बहुत कम है। खासकर ग्रामीण इलाकों में, जहाँ 70% आबादी रहती है, हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी है। अमेरिका के विपरीत, भारत में पब्लिक हेल्थ पर खर्च GDP का महज़ 1.2% - 1.5% है। ऐसे में, PE-संचालित प्राइवेट हेल्थकेयर, जो अक्सर महँगा होता है, आम लोगों की पहुँच से बाहर हो सकता है, और हेल्थकेयर को एक सामाजिक सेवा के बजाय 'पैसे निकालने का जरिया' बनने का खतरा है। इन समस्याओं से निपटने के लिए, रेगुलेटरी हस्तक्षेप (regulatory interventions) के सुझाव दिए जा रहे हैं, जैसे कि लेवरेज्ड बायआउट (leveraged buyouts) पर रोक लगाना, आम प्रोसीजर के लिए प्राइस बैंड (price bands) तय करना, ज़रूरी सेवाओं को अलग रखना और PE मालिकाना हक़ व कर्ज़ के स्तर की पारदर्शिता सुनिश्चित करना। मकसद प्राइवेट कैपिटल को रोकना नहीं, बल्कि उसे अनुशासित करना है।
आगे की राह: ग्रोथ और जवाबदेही का संतुलन
सवाल अब यह नहीं है कि PE हेल्थकेयर में हो या न हो, बल्कि यह है कि किन शर्तों पर हो। PE ने बेशक विस्तार, आधुनिकीकरण और कंसॉलिडेशन (consolidation) को बढ़ावा दिया है, खासकर टियर 2 और 3 शहरों में। लेकिन क्या भारत ऐसे मज़बूत रेगुलेटरी फ्रेमवर्क (regulatory frameworks) बना सकता है जो प्राइवेट वित्तीय हितों को पब्लिक हेल्थ के लक्ष्यों से जोड़ सकें? भारत को अमेरिका की गलतियों से सीखना होगा और कर्ज़, देखभाल की घटती गुणवत्ता या बढ़ती कीमतों के जाल में फंसने से बचना होगा। पब्लिक हेल्थ सिस्टम को एक रेगुलेटर के तौर पर मज़बूत करना और PE मालिकाना हक़ व वित्तीय सौदों में पारदर्शिता लाना ज़रूरी है। भारत के हेल्थकेयर का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह कैसे ऐसे नियम बनाता है जो जवाबदेही को बढ़ाएँ और यह सुनिश्चित करें कि कैपिटल का निवेश सिर्फ निवेशकों के मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के लिए सुलभ, समान और उच्च-गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं में बदले।