भारत में हेल्थ AI सेक्टर एक बड़े डेटा संकट से जूझ रहा है। बिखरे हुए मेडिकल रिकॉर्ड के कारण अच्छे AI मॉडल्स को ट्रेन करना मुश्किल हो गया है। अब कंपनियां मेडिकल बातचीत को स्ट्रक्चर्ड डेटा में बदलने पर जोर दे रही हैं ताकि इस सेक्टर को असली रफ्तार मिल सके।
भारत के हेल्थकेयर सेक्टर में AI को लेकर जो उत्साह था, उसे अब एक बड़े 'रियलिटी चेक' का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि इस सेक्टर में खूब पैसा आ रहा है, लेकिन एक बड़ी तकनीकी बाधा इसकी सफलता में आड़े आ रही है। समस्या कंप्यूटर पावर की नहीं, बल्कि अच्छी क्वालिटी वाले और व्यवस्थित क्लिनिकल डेटा की भारी कमी की है।
डेटा की समस्या और गहराई
भारत में ज्यादातर डॉक्टर मरीज से अपनी स्थानीय भाषा और इंग्लिश के मिश्रण में बात करते हैं। ऐसे में क्लिनिकल नोट्स या तो हाथ से लिखे होते हैं या फिर अनस्ट्रक्चर्ड ऑडियो के रूप में होते हैं। हालांकि Ayushman Bharat Digital Mission (ABHA) ने डेटा शेयरिंग का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया है, लेकिन यह क्लिनिकल डेटा बनाने में सक्षम नहीं है। बिना व्यवस्थित मेडिकल इतिहास के, AI मॉडल्स सही डायग्नोसिस या ट्रीटमेंट बताने में संघर्ष करते हैं।
अब 'भाषा' और 'स्ट्रक्चर' पर दांव
इस कमी को दूर करने के लिए अब इंडस्ट्री का रुख 'भाषाई अवसर' (Linguistic Opportunity) की तरफ मुड़ गया है। Eka Care और Sarvam AI जैसी कंपनियां इस डेटा गैप को भरने के लिए एडवांस्ड स्पीच-टू-टेक्स्ट मॉडल्स पर काम कर रही हैं। इनका मकसद डॉक्टर और मरीज के बीच हुई बातचीत को रियल-टाइम में स्ट्रक्चर्ड क्लिनिकल इंग्लिश में बदलना है।
निवेश का जोखिम और आगे का रास्ता
निवेशकों के लिए चुनौती यह है कि वे उन कंपनियों को पहचानें जो असल में डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर बना रही हैं, बजाय उनके जो केवल 'रैपर मॉडल्स' बेच रही हैं जो असल अस्पताल के माहौल में फेल हो जाते हैं। अगर डेटा गलत हुआ, तो AI के गलत नतीजे मरीजों की जान के लिए खतरा बन सकते हैं। आने वाले समय में असली वैल्यू उन्हीं कंपनियों को मिलेगी जो अस्पताल के OPD वर्कफ्लो में सही डेटा को कैप्चर करने और उसे स्ट्रक्चर करने की तकनीकी महारत हासिल करेंगी।
