जांच के दायरे में 29 FDC दवाएं: क्या हैं असली वजह?
नई दिल्ली में ड्रग रेगुलेटर्स की कड़ी नज़र 29 फिक्स्ड-डोज़ कॉम्बिनेशन (FDC) दवाओं पर है। इनमें मुख्य रूप से विटामिन और मिनरल वाली दवाएं शामिल हैं, जिन्हें बैन किया जा सकता है। वजह? एक्सपर्ट पैनल का मानना है कि इनके पास 'स्पष्ट चिकित्सीय औचित्य' (clear therapeutic justification) नहीं है। यह मामला 2015 से चल रहा है, जब CK Kokate की अगुआई वाली एक एक्सपर्ट समिति ने इन दवाओं को 'अतार्किक' (irrational) करार दिया था। अब, डॉ. Nilima Kshirsagar की अध्यक्षता वाली एक सब-कमेटी इन पर और विचार कर रही है। कंपनियों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जा रहा है, इससे पहले कि कोई आखिरी फैसला आए। DTAB पहले ही 16 ऐसी FDCs को बैन करने की सिफारिश पर मुहर लगा चुका है, जिन्हें अतार्किक पाया गया था।
भारत का लंबा नियामक संघर्ष: FDC का इतिहास
यह कोई नई बात नहीं है। भारत का FDC दवाओं के साथ एक लंबा और जटिल रिश्ता रहा है। 2016 में, 344 FDCs पर एक बड़ी कार्रवाई हुई थी, जिन्हें स्वास्थ्य जोखिमों और चिकित्सीय औचित्य की कमी के कारण बैन कर दिया गया था। लेकिन, दवा कंपनियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दिसंबर 2017 में, सुप्रीम कोर्ट ने DTAB को इन दवाओं की नए सिरे से समीक्षा करने का आदेश दिया, लेकिन यह भी माना कि शुरुआती बैन प्रक्रिया में कुछ खामियां थीं, जैसे वैधानिक प्राधिकरणों से सलाह न लेना। हाल के दिनों में, CDSCO ने 156 FDCs (अगस्त 2024) और 35 FDCs (अप्रैल 2025) को भी सुरक्षा, प्रभावकारिता और अप्रूवल बाईपास जैसी चिंताओं के चलते बैन किया है। इन सबके बावजूद, बैन की गई दवाएं अभी भी बिक रही हैं, अक्सर अदालती राहत के सहारे। असली जड़ यह है कि कई राज्य दवा लाइसेंसिंग अथॉरिटीज़ ने सेंट्रल अप्रूवल के बिना हज़ारों कॉम्बिनेशन दवाओं को लाइसेंस दे दिया।
बाजार पर असर और इंडस्ट्री पर दबाव
FDC सेगमेंट भारतीय फार्मा मार्केट का एक बड़ा हिस्सा है, जो करीब 40-50% है, यानी ₹1.3 लाख करोड़ के बाजार का बड़ा हिस्सा। अकेले विटामिन और मिनरल प्रीमिक्स का बाजार 2033 तक $2.4 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, जिसकी CAGR 8.1% है। 2016 में 344 FDCs पर लगे बैन का असर साफ दिखा था। Marksans Pharma, Wockhardt और Pfizer जैसी बड़ी कंपनियों के शेयर 20% से 55% तक गिरे थे, और FDC मार्केट में 14.6% की गिरावट आई थी। यह इतिहास बताता है कि भले ही यह समीक्षा सिर्फ 29 दवाओं पर हो, लेकिन इसका कंपनियों पर बड़ा असर पड़ेगा जो इन फॉर्मूलेशन पर निर्भर हैं। इंडस्ट्री को अब केवल वॉल्यूम-आधारित कॉम्बिनेशन से हटकर R&D और इनोवेशन पर ज़ोर देना होगा। Sun Pharma, Cipla, Dr. Reddy's, Torrent Pharma, Alkem Laboratories और FDC Ltd. जैसी बड़ी कंपनियां इस नियामक बदलाव के बीच रास्ता तलाश रही हैं।
भविष्य की राह: अनिश्चितता और चुनौतियाँ
भारत में FDC रेगुलेशन का लंबा खिंचना फार्मा सेक्टर के लिए लगातार जोखिम पैदा कर रहा है। रेगुलेटरी अनिश्चितता एक बड़ी चिंता है, क्योंकि लंबी समीक्षा प्रक्रिया R&D निवेश और भविष्य की प्लानिंग को मुश्किल बनाती है। यदि ये FDCs बैन होती हैं, तो कंपनियों को मुनाफे का भारी नुकसान हो सकता है, जैसा कि पहले भी देखा गया है। बढ़ती जांच के चलते कंप्लायंस का बोझ भी बढ़ेगा, कंपनियों को अपनी दवाओं के लिए पुख्ता क्लिनिकल सबूत पेश करने होंगे। हालांकि अभी सिर्फ विटामिन-मिनरल FDCs पर ध्यान है, लेकिन 'अतार्किक कॉम्बिनेशन' की समस्या एंटीबायोटिक FDCs में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) के बढ़ने से भी जुड़ी है। एक बड़ी चुनौती यह भी है कि सभी FDCs, उनकी बिक्री और उपयोग पैटर्न का कोई स्पष्ट, एकीकृत मार्केट डेटाबेस नहीं है, जिससे रेगुलेशन और प्रवर्तन मुश्किल हो जाता है। साथ ही, राज्य और केंद्रीय ड्रग रेगुलेटरों के बीच पुराना टकराव भी प्रभावी नियंत्रण में बाधा डालता रहा है।
आगे क्या? एक बदलता परिदृश्य
भारतीय फार्मा इंडस्ट्री एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। रेगुलेशन का रुख साफ तौर पर 'सबूत-आधारित' (evidence-based) अप्रूवल और 'स्पष्ट चिकित्सीय औचित्य' वाली दवाओं की ओर बढ़ रहा है। यह माहौल कंपनियों को अपनी R&D और प्रोडक्ट पोर्टफोलियो पर फिर से विचार करने को मजबूर कर रहा है। एनालिस्ट्स का मानना है कि भविष्य में सफलता के लिए रेगुलेटरी कंप्लायंस और इनोवेशन ही मुख्य कारक होंगे। अब केवल दवाओं की संख्या नहीं, बल्कि उनके 'वैल्यू क्रिएशन' पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाएगा। कंपनियों के लिए R&D में लगातार निवेश, वैश्विक रेगुलेटरी स्टैंडर्ड्स का पालन और ज़्यादा सख्त अप्रूवल प्रक्रिया के अनुकूल ढलना महत्वपूर्ण होगा। भारत में एक पूरी तरह से तर्कसंगत FDC मार्केट बनाने की राह कठिन है, लेकिन मौजूदा नियामक कदम सार्वजनिक स्वास्थ्य और दवा सुरक्षा को प्राथमिकता देने की प्रतिबद्धता दर्शाते हैं।