भारत की ज़रूरी दवाओं की लिस्ट (NLEM) 2022 के बाद से बदली नहीं है। इसमें WHO की **523** दवाओं की तुलना में सिर्फ **384** दवाएं शामिल हैं। इस देरी के कारण दवाओं के दाम तय करने और सरकारी अस्पतालों में ज़रूरी इलाज की पहुँच पर असर पड़ रहा है, जिससे मरीज़ों पर प्राइवेट मार्केट से महंगी दवाएं खरीदने का दबाव बढ़ सकता है।
ज़रूरी दवाओं की लिस्ट अटकी, क्या है पूरा मामला?
भारत की ज़रूरी दवाओं की लिस्ट (National List of Essential Medicines - NLEM) 2022 से अपडेट नहीं हुई है। इस वजह से देश की दवा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था (drug price regulation framework) और वैश्विक स्वास्थ्य मानकों (global healthcare standards) के बीच एक बड़ी खाई बनती जा रही है। जहाँ विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) अपनी ज़रूरी दवाओं की लिस्ट को दो बार अपडेट करके 523 दवाएं शामिल कर चुका है, वहीं भारत की लिस्ट 384 दवाओं पर ही अटकी हुई है। यह चिंता का विषय है, खासकर तब जब देश में नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज (non-communicable diseases) यानी गैर-संचारी रोगों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जो अब देश की लगभग दो-तिहाई मौतों के लिए जिम्मेदार हैं।
कीमतों पर नियंत्रण और पहुँच पर असर
NLEM में शामिल दवाओं पर नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) की ओर से सख्त प्राइस कैप (price caps) लागू होते हैं। इन दवाओं को सरकारी अस्पतालों (government hospitals) और पब्लिक हेल्थ सेंटर्स (public health centers) में खरीद के लिए प्राथमिकता भी दी जाती है। लेकिन जब कोई दवा NLEM से बाहर हो जाती है, तो वह अक्सर इन प्राइस कंट्रोल्स से भी बाहर हो जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि कैंसर (cancer), डायबिटीज (diabetes) और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों (cardiovascular diseases) जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए ज़रूरी एडवांस्ड थेरेपी (advanced therapies) खरीदने वाले मरीज़ों को अक्सर प्राइवेट मार्केट का रुख करना पड़ता है। ऐसे में परिवारों पर इलाज का खर्च काफी बढ़ जाता है, क्योंकि इन जीवन रक्षक दवाओं का कोई जेनेरिक विकल्प (generic equivalent) या सरकारी तय कीमत (government-mandated price ceiling) मौजूद नहीं होती।
कैंसर और क्रॉनिक केयर में बड़ी कमी
एक्सपर्ट्स ने मौजूदा लिस्ट में कई गंभीर कमियां बताई हैं। उन्होंने कहा कि कई मॉडर्न थेरेपी, जो पहले से ही WHO की सिफारिशों में शामिल हैं, इस लिस्ट से नदारद हैं। इनमें 17 कैंसर से संबंधित दवाएं, 9 मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़ (monoclonal antibodies) और 4 सपोर्टिव ऑन्कोलॉजी दवाएं (supportive oncology drugs) शामिल हैं। भारत में 2030 तक कैंसर के मामलों में 24% की बढ़ोतरी का अनुमान है और देश पहले से ही दुनिया में डायबिटीज के सबसे बड़े बोझ वाले देशों में से एक है। ऐसे में इन ज़रूरी दवाओं का लिस्ट में शामिल न होना, किफ़ायती स्वास्थ्य सेवा (affordable healthcare) की पहुँच को सीमित करता है।
फार्मा कंपनियों के लिए NLEM एक बड़ा रेगुलेटरी फैक्टर है। लिस्ट में शामिल होने से सरकारी टेंडर्स (government tenders) के ज़रिए बिक्री की मात्रा तो बढ़ती है, लेकिन प्राइस सीलिंग (price ceilings) के कारण मुनाफे का मार्जिन कम हो जाता है। वहीं, जो प्रोडक्ट्स लिस्ट में नहीं हैं, उन्हें खुले बाज़ार (open market) में कीमतें तय करने की ज़्यादा आज़ादी मिलती है, लेकिन उन्हें ब्रांड पोजिशनिंग (brand positioning) और प्राइवेट डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क (private distribution networks) पर निर्भर रहना पड़ता है।
रेगुलेटरी अपडेट्स पर नज़र
पूरे हेल्थकेयर सेक्टर के लिए वित्तीय असर इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार अगली बार इस लिस्ट को कब रिवाइज करने का फैसला करती है। फार्मा सेक्टर में निवेशक (investors) इन अपडेट्स पर बारीकी से नज़र रखते हैं, क्योंकि NLEM का अचानक विस्तार क्रॉनिक थेरेपी में विशेषज्ञता रखने वाली कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन प्रोफाइल को बदल सकता है। आने वाले महीनों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि क्या स्वास्थ्य मंत्रालय (Ministry of Health) या NPPA की ओर से लिस्ट की समीक्षा और विस्तार के लिए नई विशेषज्ञ समितियों (expert committees) के गठन की कोई आधिकारिक घोषणा होती है।
