NLEM में कैंसर और डायबिटीज की दवाएं गायब! आम आदमी की पहुँच से बाहर होंगी जीवनरक्षक दवाएं?

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AuthorAditya Rao|Published at:
NLEM में कैंसर और डायबिटीज की दवाएं गायब! आम आदमी की पहुँच से बाहर होंगी जीवनरक्षक दवाएं?

भारत की एसेंशियल मेडिसिन लिस्ट (NLEM) से कई अहम कैंसर और डायबिटीज की दवाएं गायब हैं। एक नागरिक समाज समूह ने चिंता जताई है कि WHO द्वारा जरूरी बताई गई इन दवाओं का NLEM में शामिल न होना, देश में मरीजों के लिए इन जीवनरक्षक दवाओं की पहुँच और कीमत पर असर डाल सकता है।

क्या हुआ है?

'वर्किंग ग्रुप ऑन एक्सेस टू मेडिसिन्स एंड ट्रीटमेंट्स' नामक एक नागरिक समाज समूह ने राष्ट्रीय औषधि समिति (SNCM) से भारत की राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (NLEM) को तुरंत अपडेट करने की मांग की है। समूह का कहना है कि भारत की वर्तमान NLEM, जिसे आखिरी बार 2022 में अधिसूचित किया गया था, उसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा आवश्यक मानी गई एक दर्जन से अधिक महत्वपूर्ण दवाएं शामिल नहीं हैं। जहाँ WHO की सूची 2023 और 2025 में अपडेट होकर 523 दवाओं तक पहुँच गई है, वहीं भारतीय NLEM में केवल 384 दवाएं ही शामिल हैं। इस समूह ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और संबंधित विभागों के सचिवों से इस प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरा करने की अपील की है।

निवेशकों के लिए क्यों है यह अहम?

NLEM भारत की स्वास्थ्य नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि यह सीधे फार्मास्युटिकल सेक्टर को प्रभावित करता है। इस सूची में शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा निर्धारित की जाती है। जब कोई दवा NLEM में शामिल होती है, तो उसकी कीमत नियंत्रित हो जाती है, जिससे निर्माता कंपनियों के लाभ मार्जिन पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, नई और महंगी दवाओं का सूची से बाहर रहना कंपनियों को कीमत तय करने में अधिक छूट देता है। फार्मा सेक्टर में निवेशक NLEM में होने वाले बदलावों पर करीब से नजर रखते हैं, क्योंकि ये बदलाव विशेष कैंसर और मधुमेह के इलाज पर निर्भर कंपनियों के राजस्व और लाभप्रदता को महत्वपूर्ण रूप से बदल सकते हैं।

मरीजों और राजस्व पर असर

समूह ने विशेष रूप से 17 कैंसर-रोधी दवाओं की अनुपस्थिति पर प्रकाश डाला है, जिनमें Abiraterone, Pembrolizumab, और Bevacizumab जैसी दवाएं शामिल हैं। इसके अलावा, नौ मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, जिनका उपयोग लक्षित कैंसर उपचारों में बढ़ रहा है, भी वर्तमान सूची से गायब हैं। फार्मा कंपनियों के लिए, इन दवाओं को NLEM में शामिल करने से सरकारी खरीद के माध्यम से इनकी मांग बढ़ सकती है, लेकिन यह कम, सरकार द्वारा निर्धारित कीमतों पर होगा। निजी अस्पतालों और स्वास्थ्य बीमा प्रदाताओं के लिए भी, इन दवाओं का शामिल होना या न होना देखभाल की लागत और बीमा योजनाओं के दायरे को प्रभावित करता है।

असली कारोबारी हकीकत

भारत का फार्मा उद्योग, दवाओं की सामर्थ्य (affordability) और निवेश पर रिटर्न की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाकर चलता है, खासकर मोनोक्लोनल एंटीबॉडी जैसी महंगी और जटिल दवाओं के मामले में। यदि सरकार इन दवाओं को NLEM में शामिल करने की प्रक्रिया तेज करती है, तो जो कंपनियां वर्तमान में इन उत्पादों को प्रीमियम कीमतों पर बेच रही हैं, उन्हें अपने मार्जिन में दबाव का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, यदि इन उपचारों की जेनेरिक आपूर्ति श्रृंखला में अग्रणी कंपनियां NLEM में शामिल होने के बाद सरकारी अस्पतालों में व्यापक रूप से उपयोग की जाती हैं, तो वे वॉल्यूम वृद्धि देख सकती हैं। इस समीक्षा की गति एक महत्वपूर्ण कारक है, क्योंकि यह निर्धारित करता है कि ये नियामक परिवर्तन कंपनी के मुनाफे को कितनी जल्दी प्रभावित करते हैं।

आगे क्या देखना है?

निवेशकों को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से SNCM के गठन या उसके निष्कर्षों के संबंध में आधिकारिक सूचनाओं पर नजर रखनी चाहिए। क्या सरकार NLEM को वैश्विक WHO मानकों के अनुरूप विस्तारित करने का इरादा रखती है, इस पर भविष्य के अपडेट मुख्य उत्प्रेरक होंगे। इसके अतिरिक्त, बाजार प्रतिभागी उच्च-मूल्य वाली ऑन्कोलॉजी दवाओं के लिए संभावित मूल्य-कैपिंग रणनीतियों के संबंध में NPPA से किसी भी आगामी घोषणाओं पर नज़र रख सकते हैं, क्योंकि ये सीधे क्षेत्र की दीर्घकालिक लाभप्रदता और पूंजी आवंटन रणनीतियों को प्रभावित करेंगी।

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