भारत में हार्ट की बीमारियों का इलाज तो बेहतरीन है, लेकिन अस्पताल से छुट्टी के बाद दवाइयों का कोर्स पूरा न करना एक बड़ी चुनौती है। अब हॉस्पिटल्स इस कमी को दूर करने के लिए डिजिटल हेल्थ और रिमोट मॉनिटरिंग टूल्स अपना रहे हैं।
भारत का मेडिकल सेक्टर एक बड़ी मुश्किल का सामना कर रहा है: अस्पताल हार्ट से जुड़ी समस्याओं का इलाज तो सफलता से कर लेते हैं, लेकिन घर लौटने के बाद मरीज की सेहत बिगड़ने लगती है। डेटा के मुताबिक, डिस्चार्ज होने के महज 6 महीने के भीतर जरूरी दवाइयां लेने वाले मरीजों की संख्या में 16% से 42% तक की भारी गिरावट आती है। यह बताता है कि मौजूदा हेल्थकेयर सिस्टम केवल अस्पताल में भर्ती होने तक सीमित है, जबकि मरीजों को लंबे समय तक सपोर्ट की जरूरत है।\n\nइस समस्या का असर देश की वर्किंग-एज आबादी पर ज्यादा पड़ रहा है। यही कारण है कि अब बड़े हॉस्पिटल चेन और हेल्थ-टेक कंपनियां डिजिटल टूल्स में निवेश बढ़ा रही हैं। ये तकनीकें डॉक्टरों को मरीजों की रिकवरी ट्रैक करने, दवाइयां एडजस्ट करने और दूर से ही वाइटल्स मॉनिटर करने की सुविधा देती हैं, जिससे बार-बार अस्पताल जाने का खर्च कम होता है।\n\nभारतीय हेल्थकेयर इंडस्ट्री के लिए यह 'कनेक्टेड केयर' का युग है। अब हॉस्पिटल्स सिर्फ बेड ऑक्यूपेंसी पर निर्भर रहने के बजाय ऐप-आधारित सब्सक्रिप्शन, टेलीकंसल्टेशन और होम-केयर के जरिए रिकरिंग रेवेन्यू मॉडल तैयार कर रहे हैं। फिलहाल, केवल 1 में से 4 कार्डियोलॉजिस्ट के पास ही व्यवस्थित रिहैब प्रोग्राम है, जिसे कंपनियां भरने की कोशिश कर रही हैं।\n\nहालांकि, इस बदलाव के साथ कुछ जोखिम भी हैं। डिजिटल स्टार्टअप्स से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के अलावा डेटा प्राइवेसी और हॉस्पिटल वर्कफ्लो में तकनीक को जोड़ने के लिए बड़े पैमाने पर कैपिटल खर्च की जरूरत है। भविष्य में वही कंपनियां सफल होंगी जो क्लिनिकल रिजल्ट्स साबित कर सकेंगी और मरीजों को अपने डिजिटल प्लान के साथ जोड़कर रख सकेंगी।
