भारत में नई दवाएं बनाने वाली बायोटेक स्टार्टअप्स को लंबी अवधि का निवेश जुटाने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। अभी निवेश का अधिकांश हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जा रहा है। सरकार के **₹10,000 करोड़** के 'Biopharma Shakti' प्रोग्राम से सेक्टर को उम्मीद है, लेकिन आरएंडडी (R&D) का जोखिम निवेशकों के लिए अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
मैन्युफैक्चरिंग बनाम इनोवेशन का अंतर
भारतीय बायोटेक सेक्टर में पूंजी का बंटवारा एक बड़े असंतुलन का सामना कर रहा है। कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च एंड डेवलपमेंट मैन्युफैक्चरिंग ऑर्गनाइजेशन (CRDMOs) और पुरानी फार्मा कंपनियां अपने स्थापित बिजनेस मॉडल के कारण आसानी से निवेश खींच लेती हैं। इसके विपरीत, जो स्टार्टअप नए मॉलिक्यूल (molecules) विकसित कर रहे हैं, उन्हें फंड के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
लंबी अवधि का निवेश और जोखिम
निवेशकों के लिए मैन्युफैक्चरिंग-आधारित कंपनियां कम जोखिम वाली और सुरक्षित कैश-फ्लो वाली होती हैं। वहीं, नई दवा बनाने की प्रक्रिया बेहद महंगी और लंबी है, जिसमें 10 साल से भी ज्यादा का समय लग सकता है। स्थानीय वेंचर कैपिटल इकोसिस्टम अभी तक इस तरह के लंबे 'जेस्टेशन पीरियड' (gestation period) को सपोर्ट करने के लिए तैयार नहीं है।
क्या है सरकारी मास्टर प्लान?
इंडस्ट्री की मांग है कि सरकार रिस्क-शेयरिंग मैकेनिज्म लेकर आए, ताकि प्राइवेट निवेशकों का भरोसा बढ़े। ₹10,000 करोड़ का 'Biopharma Shakti' प्रोग्राम इसी दिशा में एक कदम है। इसका मकसद एकेडमिक लैब्स और कमर्शियल फार्मा इंडस्ट्री के बीच एक मजबूत कड़ी बनाना है ताकि आरएंडडी पाइपलाइन को रफ्तार मिल सके।
भविष्य की राह
सेक्टर की ग्रोथ के लिए सिर्फ फंड ही नहीं, बल्कि रेगुलेटरी और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) फ्रेमवर्क में सुधार की भी जरूरत है। भारत में हाई आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च और स्वास्थ्य बीमा की कम पहुंच के कारण कंपनियों को नई दवाएं बाजार में उतारने में मुश्किल होती है। फिलहाल, इस सेक्टर में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए कंपनी का रेवेन्यू नहीं, बल्कि क्लिनिकल ट्रायल की प्रोग्रेस और सरकारी पॉलिसी का अपडेट सबसे महत्वपूर्ण है।
