भारत में क्रांति! कैंसर का इलाज और पानी की शुद्धता के लिए नई तकनीकें हुईं लॉन्च

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारत में क्रांति! कैंसर का इलाज और पानी की शुद्धता के लिए नई तकनीकें हुईं लॉन्च

भारतीय वैज्ञानिकों ने कमाल कर दिया है! मोहाली के INST ने कैंसर के इलाज के लिए लाइट-ड्रिवन नैनोबोट्स बनाए हैं, वहीं IIT गुवाहाटी ने पानी की जांच के लिए E-Eye नाम का पोर्टेबल डिवाइस पेश किया है। ये डीप-टेक रिसर्च में बड़ी छलांग हैं।

कैंसर का नया इलाज: नैनोबोट्स

मोहाली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (INST) के शोधकर्ताओं ने लाइट-ड्रिवन नैनोबोट्स बनाने में सफलता हासिल की है, जो खास तौर पर ब्रेस्ट कैंसर की कोशिकाओं को निशाना बनाकर उन्हें खत्म कर सकते हैं। यह तकनीक 'अप-कनवर्जन नैनोपार्टिकल्स' का इस्तेमाल करती है, जो नियर-इन्फ्रारेड (NIR) लाइट को गर्मी में बदल देते हैं। यूवी लाइट के विपरीत, NIR लाइट शरीर के अंदरूनी हिस्सों तक आसानी से पहुंच सकती है, जिससे स्वस्थ टिशू को कम नुकसान होता है। इन नैनोबोट्स को फोलिक एसिड से कोट किया गया है, ताकि ये सिर्फ कैंसर सेल्स से ही जुड़ सकें, जिनमें फोलिक एसिड रिसेप्टर्स ज्यादा होते हैं। हालांकि, जानवरों पर किए गए शुरुआती परीक्षणों के नतीजे काफी उत्साहजनक हैं, लेकिन इस मेडिकल तकनीक को लैब से इंसानों तक पहुंचाने की प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल होगी। इसमें भारत की CDSCO जैसी रेगुलेटरी एजेंसियों से मंजूरी लेना एक बड़ी चुनौती है।

पानी की शुद्धता का भरोसेमंद साथी: E-Eye

वहीं, IIT गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने पर्यावरण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण आविष्कार किया है। उन्होंने E-Eye नाम का एक पोर्टेबल ऑप्टिकल डिवाइस विकसित किया है, जो पानी में मौजूद हानिकारक तत्वों जैसे आर्सेनिक, लेड, आयरन, क्रोमियम, फ्लोराइड और ई. कोलाई का मौके पर ही पता लगा सकता है। इस डिवाइस की यूनिट की कीमत लगभग ₹3,500 है और हर टेस्ट का खर्च करीब ₹2 आता है। यह डिवाइस रंग परिवर्तन के जरिए जहरीले पदार्थों की पहचान करता है और इसका डेटा वायरलेस तरीके से वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट्स तक भेजता है। अकादमिक शोध को बाजार तक पहुंचाने के लिए, टीम ने Envionix Labs Pvt Ltd नाम से एक स्टार्टअप भी शुरू किया है। इस प्रोडक्ट की सफलता बड़े पैमाने पर उत्पादन, मौजूदा लैब उपकरणों की तुलना में लागत-प्रभावशीलता और सरकारी या औद्योगिक जल उपचार सुविधाओं द्वारा इसे अपनाने पर निर्भर करेगी।

नई ऊर्जा सामग्री में P3C टेक्नोलॉजी

इसके अलावा, गुरुग्राम स्थित P3C टेक्नोलॉजी एंड सॉल्यूशंस नई ऊर्जा सामग्री, खासकर 'पेरोव्स्काइट-आधारित फ्लेक्सिबल सोलर सेल्स' पर काम कर रही है। पारंपरिक कठोर सोलर पैनल के विपरीत, ये पतली-फिल्म वाली सेल्स पहनने योग्य उपकरणों (wearables) और वाहनों जैसी विभिन्न सतहों पर इस्तेमाल की जा सकती हैं। कंपनी वर्तमान में पेरोव्स्काइट तकनीक की आम समस्याओं, जैसे सामग्री की टिकाऊपन और बड़े पैमाने पर उत्पादन में एकरूपता, को हल करने के लिए पायलट प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है।

डीप-टेक इनोवेशन का 'वैली ऑफ डेथ'

डीप-टेक इनोवेशन पर नजर रखने वाले पाठकों के लिए, इन तकनीकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती 'वैली ऑफ डेथ' है – यानी एक सफल शोध प्रोटोटाइप से व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य, बड़े पैमाने के उत्पाद में परिवर्तित होने की कठिन यात्रा। निवेशक अक्सर लाइसेंसिंग अवसरों, बड़ी लिस्टेड टेक्नोलॉजी या फार्मा कंपनियों के साथ संभावित साझेदारी, या भविष्य में अधिग्रहण के लिए इस चरण पर नजर रखते हैं। इस चरण में लगातार फंडिंग की जरूरत, बड़े पैमाने पर उत्पादन की तकनीकी चुनौतियां, और बाजार में मौजूदा, लागत-कुशल विकल्पों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता जैसे जोखिम शामिल हैं। इन नवाचारों के लिए अगला महत्वपूर्ण कदम व्यावसायिक लाइसेंसिंग की प्रगति, E-Eye डिवाइस के सफल फील्ड ट्रायल और पेरोव्स्काइट सोलर सेल्स के टिकाऊपन परीक्षण में सुधार देखना होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.