भारत के शोधकर्ताओं ने कैंसर के दोबारा होने की पहचान के लिए एक नई AI (Artificial Intelligence) प्रणाली और कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट्स को कम करने वाली एक प्रायोगिक दवा विकसित की है। ये वैज्ञानिक नवाचार अभी शुरुआती रिसर्च स्टेज में हैं और इलाज को ज़्यादा सटीक बनाने पर केंद्रित हैं।
भारत में कैंसर रिसर्च में दो बड़े कदम
देश के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों के वैज्ञानिकों ने कैंसर रिसर्च में दो महत्वपूर्ण विकास की घोषणा की है। इनका मकसद डॉक्टरों को कैंसर के दोबारा लौटने (relapse) का पता लगाने और कैंसर कोशिकाओं के इलाज के तरीकों को बेहतर बनाना है। ये प्रोजेक्ट्स अभी शुरुआती, प्री-क्लिनिकल (preclinical) रिसर्च स्टेज में हैं।
ACSCeND: कैंसर सेल्स का पता लगाने वाला AI टूल
पहला विकास ACSCeND नामक एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) फ्रेमवर्क है। इसे एस.एन. बोस नेशनल सेंटर फॉर बेसिक साइंसेज (S.N. Bose National Centre for Basic Sciences) ने अशोका यूनिवर्सिटी (Ashoka University) के सहयोग से बनाया है। यह टूल जटिल जेनेटिक डेटा का विश्लेषण करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसका मुख्य काम कैंसर स्टेम-लाइक सेल्स (cancer stem-like cells) की पहचान करना है, जो अक्सर ट्यूमर के दोबारा बढ़ने के पीछे छिपे हुए कारण होते हैं। डीप लर्निंग (deep learning) का उपयोग करके RNA सीक्वेंसिंग डेटा की व्याख्या करके, यह टूल इन कोशिकाओं को विभिन्न अवस्थाओं में वर्गीकृत करने में मदद करता है, जिससे यह समझने में मदद मिलती है कि कैंसर कैसे वापस आ सकता है।
RK-251: कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट्स को कम करने वाली दवा
इसके साथ ही, एडवांस्ड स्टडी इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IASST) और आईआईटी-गुवाहाटी (IIT-Guwahati) के वैज्ञानिकों ने RK-251 नामक एक प्रायोगिक स्मॉल-मॉलिक्यूल कंपाउंड (small-molecule compound) विकसित किया है। पारंपरिक कीमोथेरेपी में अक्सर कैंसर वाली कोशिकाओं के साथ-साथ स्वस्थ कोशिकाएं भी प्रभावित होती हैं, जिससे मरीजों को गंभीर साइड इफेक्ट्स होते हैं। RK-251 एक "स्मार्ट" दवा के रूप में काम करती है जो शरीर में घूमते समय निष्क्रिय रहती है। इसे केवल तब सक्रिय होने और कैंसर को मारने वाले एजेंट को छोड़ने के लिए डिज़ाइन किया गया है जब यह किसी घातक कोशिका (malignant cell) के विशिष्ट वातावरण में प्रवेश करती है, जिसमें आमतौर पर रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज (reactive oxygen species) का स्तर ज़्यादा होता है। कैंसर कोशिकाओं और ज़ेब्राफिश भ्रूण (zebrafish embryos) पर हुए प्रयोगशाला परीक्षणों से पता चला है कि यह कंपाउंड ट्यूमर को प्रभावी ढंग से लक्षित कर सकता है, जबकि गैर-कैंसर वाले टिशू को बहुत कम नुकसान पहुंचाता है।
ये अभी शुरुआती रिसर्च हैं: निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी
यह समझना महत्वपूर्ण है कि ये दोनों विकास अभी अकादमिक रिसर्च प्रोजेक्ट्स हैं। ये कोई कमर्शियल उत्पाद या सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनियों के स्वामित्व वाली तकनीकें नहीं हैं। चूंकि ये विकास प्री-क्लिनिकल रिसर्च स्टेज में हैं, इसलिए इनका अभी तक इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल (human clinical trials) नहीं हुआ है। लैब मॉडल या पशु परीक्षणों में सफलता एक सकारात्मक शुरुआती संकेत है, लेकिन यह गारंटी नहीं देता कि भविष्य में यह तकनीक इंसानों के लिए सुरक्षित या प्रभावी होगी।
निवेशकों और आम जनता को इन्हें व्यावसायिक या बाजार की तत्काल घटनाएं मानने के बजाय वैज्ञानिक ज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान के रूप में देखना चाहिए। इन तकनीकों के अगले चरणों में आमतौर पर और अधिक सत्यापन, कठोर क्लिनिकल रिसर्च और संभावित लाइसेंसिंग या विकास शामिल होता है, जिसमें रिसर्च पेपर से एक व्यवहार्य चिकित्सा उपचार बनने में कई साल लग सकते हैं।
